चतुर्भज जगन्नाथ काष्ठ शोभित...
Updated at : 20 Jun 2017 4:58 AM (IST)
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350 वर्ष पुरानी है खरसावां में प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा रियासती काल से चली आ रही परंपरा के अनुसार निकलती है प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा पहले दाश परिवार के यहां पूजे जाते थे प्रभु जगन्नाथ और अब राजमहल में है मंदिर खरसावां : खरसावां में प्रभु जगन्नाथ के रथयात्रा की तैयारी शुरू कर […]
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350 वर्ष पुरानी है खरसावां में प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा
रियासती काल से चली आ रही परंपरा के अनुसार निकलती है प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा
पहले दाश परिवार के यहां पूजे जाते थे प्रभु जगन्नाथ और अब राजमहल में है मंदिर
खरसावां : खरसावां में प्रभु जगन्नाथ के रथयात्रा की तैयारी शुरू कर दी गयी है. यहां की रथ यात्रा करीब 350 वर्ष पुरानी है. यहां हर सालपारंपरिक रूप से महा प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है. खरसावां में शुरुआत के दिनों में (1672 के आस-पास) प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा खरसावां के पं गोविंद दाश के घर में पूजे जाते थे. बाद में खरसावां के तत्कालीन राजा ने प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा की प्रतिमा को दाश परिवार के यहां से राजमहल में लाकर पूजा-अर्चना शुरू की. राजमहल परिसर में ही प्रभु जगन्नाथ का मंदिर भी बनाया गया. यहां पूरे पारंपरिक ढंग से रथ यात्रा का आयोजन होता है. अब राजमहल परिसर स्थित
मंदिर में ही प्रभु जगन्नाथ की पूजा अर्चना की जाती है. कहा जाता है कि राजमहल के पीछे बह रही सोना नदी के तट पर जगन्नाथ के शक्ल में मिली लकड़ी से प्रभु की प्रतिमा बना कर दाश परिवार ने पूजा अर्चना शुरू की थी.
छेरो पोहरा के पश्चात निकलती है प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा:
खरसावां में रथ यात्रा का आयोजन ओड़िशा के पुरी की तर्ज पर किया जाता है. खरसावां के राजा या युवराज द्वारा छेरा पोहरा नामक रश्म अदायगी की जाती है. इसके पश्चात ही यहां प्रभु जगन्नाथ का रथ निकलता है. राजा सड़क पर चंदन छिड़क करझाडू लगाते हैं. इसके पश्चात ही प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा की प्रतिमा मंदिर से बाहर सड़क पर निकाला जाता है. बीच सड़क में तीनों ही प्रतिमाओं को रखकर पूजा-अर्चना करने के पश्चात रथ पर चढ़ा कर मौसीबाड़ी के लिये ले जाया जाता है.
रथ यात्रा में सरकारी फंड से खर्च होंगे 55 हजार:खरसावां में रथ यात्रा का आयोजन स्थानीय लोगों के सहयोग से सरकारी स्तर पर होता है. रथयात्रा पर खर्च होने वाली राशि का वहन राज्य सरकार करती है. इस वर्ष रथ यात्रा में सरकारी फंड से 55 हजार की राशि खर्च होगी. रियासत काल में रथ यात्रा में होने वाले सभी खर्च राजपरिवार उठाता था. देश की आजादी के पश्चात तमाम देशी रियासतों के भारत गणराज्य में विलय के बाद खरसावां में रथयात्रा का आयोजन सरकारी खर्च पर होने लगा. देश की आजादी के पश्चात सरकार के साथ हुए समझौता के बाद यह खर्च राज्य सरकार उठाती है. रथ यात्रा के आयोजन में राजपरिवार के साथ-साथ स्थानीय लोगों भी सहयोग करते हैं.
2012 में बना है नया रथ:खरसावां में 2012 में नया रथ बनाया गया है. तत्कालिन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने निजी स्तर से खरसावां के लिये नया रथ बनवाया है. ओड़िशा से आये कारीगरों ने इस रथ का निर्माण किया है. 16 चक्का वाले इस रथ के आगे लकड़ी से बनाये गये घोड़ा व रथ को चलाने वाले सारथी भी बनाये गये हैं.
रथ से भक्तों के बीच बांटा जाता है लड्डू: रथ यात्रा के दौरान रथ से भक्तों के बीच प्रसाद स्वरूप लड्डू का वितरण किया जाता है. रथ यात्रा के दौरान रथ के आगे आगे भजन कीर्तन करते कीर्तन मंडली रहती है. इसे देखने के लिये बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.
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