परिसीमन के विरोध में रांची के मोरहाबादी में जुटे 1 लाख लोग, आदिवासी महाजुटान में गूंजी एकता की आवाज

Updated:
विज्ञापन

रांची के मोरहाबादी मैदान में आदिवासी एकता महाजुटान में आदिवासी नेता और आदिवासी समुदाय के लोग. फोटो: प्रभात खबर

रांची के मोरहाबादी मैदान में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान रैली में परिसीमन को लेकर समाज की गहरी चिंताएं सामने आईं. लाखों की भीड़ ने अपने अधिकारों के लिए एकजुटता दिखाई, जो इस मुद्दे के महत्व को दर्शाता है.

विज्ञापन


आपके शहर में

विज्ञापन

रांची से नवीन शर्मा की रिपोर्ट

Adiwasi Mahajutan on Delimitaion: केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित परिसीमन के विरोध में राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में रविवार को आदिवासी एकता महाजुटान रैली का आयोजन किया गया. पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के नेतृत्व में आयोजित इस महाजुटान में झारखंड के विभिन्न जिलों से करीब एक लाख आदिवासी समाज के लोगों के पहुंचने का दावा किया जा रहा है. सुबह से ही अलग-अलग जिलों से लोगों के रांची पहुंचने का सिलसिला जारी रहा. कार्यक्रम में महिलाएं, बुजुर्ग, युवा और बच्चे तक शामिल हुए.

प्रस्तावित परिसीमन पर चिंतित दिखा आदिवासी समाज

मंच से सबसे बड़ा मुद्दा प्रस्तावित परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज की चिंता रही. महाजुटान में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, प्रभारी के. राजू, रामेश्वर उरांव, मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, सुबोध कांत सहाय, सुखदेव भगत, विधायक राजेश कच्छप, नमन विक्सल कोंगाड़ी और ऑल इंडिया आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ विक्रांत भूरिया समेत कई नेता मौजूद रहे.

चंदा कर आए लोग, मजदूरी छोड़ महाजुटान में शामिल

मोरहाबादी मैदान में जुटी भीड़ में सिर्फ राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि गांवों और आदिवासी इलाकों से आए आम लोग भी नजर आए. कई बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि वे चंदा इकट्ठा कर रांची पहुंची हैं. कुछ लोगों ने कहा कि उन्होंने एक दिन की दिहाड़ी छोड़कर महाजुटान में हिस्सा लिया, क्योंकि यह उनके समाज और आने वाली पीढ़ियों के अधिकार से जुड़ा सवाल है. कई महिलाएं अपने साथ खाना-पानी लेकर पहुंचीं. मैदान में बैठकर रोटी खाते हुए भी महिलाएं नजर आईं. इसका मतलब यह कि आदिवासी महाजुटान सिर्फ राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के एक बड़े वर्ग की चिंता और भागीदारी का प्रदर्शन भी बना.

आखिर परिसीमन को लेकर झारखंड में इतनी चिंता क्यों?

परिसीमन का मतलब लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का नए सिरे से निर्धारण करना है. संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत जनगणना के बाद संसद कानून बनाकर परिसीमन की प्रक्रिया शुरू कर सकती है. इसके लिए केंद्र सरकार परिसीमन आयोग गठित करती है. आयोग जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति, प्रशासनिक सीमाओं, संचार सुविधा और जनसुविधा जैसे पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण करता है.

झारखंड में कैसा है सीटों का वर्तमान परिसीमन

झारखंड में मौजूदा लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का ढांचा पुराने परिसीमन के आधार पर है. आदिवासी समाज की चिंता खास तौर पर एसटी आरक्षित सीटों को लेकर है. फिलहाल झारखंड विधानसभा में 28 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं, जबकि लोकसभा में 5 सीटें एसटी आरक्षित हैं.

क्या है आदिवासी संगठनों का तर्क

आदिवासी संगठनों का तर्क है कि अगर भविष्य में केवल जनसंख्या के अनुपात को आधार बनाकर सीटों और निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन किया गया, तो आदिवासी बहुल क्षेत्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है. उनका कहना है कि परिसीमन में सिर्फ जनसंख्या ही नहीं, बल्कि आदिवासी बहुल क्षेत्रों की विशेष परिस्थितियों, ऐतिहासिक विस्थापन और संवैधानिक संरक्षणों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.

क्या अनुच्छेद 342 में बदलाव की है जरूरत

मंच से यह संदेश भी दिया गया कि अगर संविधान के अनुच्छेद 342 में बदलाव की जरूरत महसूस होती है, तो उसके लिए संविधान संशोधन का रास्ता अपनाया जाना चाहिए. नेताओं ने आरोप लगाया कि कुछ ताकतें झारखंड की राजनीति के आदिवासी केंद्रित स्वरूप को कमजोर करना चाहती हैं।

‘अब नहीं तो कभी नहीं’ का नारा

मोरहाबादी मैदान से आदिवासी समाज ने साफ संदेश देने की कोशिश की कि परिसीमन को केवल सीटों के पुनर्गठन के रूप में नहीं देखा जा सकता. उनके लिए यह राजनीतिक प्रतिनिधित्व, जमीन, पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा सवाल है. इसीलिए महाजुटान में ‘अब नहीं तो कभी नहीं’ का नारा गूंजा. दिहाड़ी छोड़कर पहुंचे मजदूर हों या चंदा जुटाकर बुजुर्ग महिलाएं रांची पहुंची. मोरहाबादी का यह जुटान बताता है कि परिसीमन का मुद्दा अब झारखंड में सिर्फ राजनीतिक दलों के मंच तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि आदिवासी समाज के बीच भी इसे अपने भविष्य और राजनीतिक हिस्सेदारी के सवाल के तौर पर देखा जा रहा है.

क्या झारखंड में घटेंगी एसटी सीटें?

हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि परिसीमन के बाद झारखंड में एसटी सीटें निश्चित रूप से घटेंगी, ऐसा अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है. मौजूदा प्रस्तावित मॉडल और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर सीटों में बदलाव का आकलन किया जा रहा है. 2011 की जनगणना के आधार पर एक संसदीय मॉडल में झारखंड की लोकसभा सीटें 14 से बढ़कर 15 होने का अनुमान लगाया गया था.

केंद्र सरकार ने परिसीमन के लिए क्या किया?

परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 में बड़ा विधायी कदम उठाया था. सरकार ने लोकसभा में तीन संबंधित विधेयक पेश किए. इनमें संविधान (131वां संशोधन) विधेयक-2026, परिसीमन विधेयक-2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक-2026 शामिल हैं.

इसे भी पढ़ें: "विदेश से आने वाले पैसे से क्यों डर रही सरकार.." अखिलेश यादव ने FCRA-परिसीमन बिल पर BJP को घेरा

543 से बढ़कर 816 होंगी लोकसभा की सीटें

प्रस्तावित व्यवस्था में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या बढ़ाकर करीब 816 सीट किए जाने का मॉडल सामने रखा गया था. सरकार का तर्क था कि इससे सभी राज्यों की सीटें बढ़ेंगी और ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को मजबूत किया जाएगा. केंद्र की ओर से यह भी कहा गया कि 2029 तक होने वाले चुनाव मौजूदा सीटों और व्यवस्था के तहत ही होंगे.

इसे भी पढ़ें: परिसीमन से क्या आदिवासी सीटों का होगा नुकसान? निशा उरांव ने आदिवासी महाजुटान पर उठाए सवाल


विज्ञापन

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola