परिसीमन से क्या आदिवासी सीटों का होगा नुकसान? निशा उरांव ने आदिवासी महाजुटान पर उठाए सवाल

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आईआरएस अफसर निशा उरांव. फोटो: प्रभात खबर

झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर आदिवासी समुदाय में चिंता है कि कहीं आदिवासी सीटों का नुकसान न हो जाए. हालांकि, IRS अधिकारी निशा उरांव का मानना है कि यह भय निराधार है और उन्होंने इसके पीछे के कारणों का खुलासा किया है.

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रांची से नवीन शर्मा की रिपोर्ट

Jharkhand Delimitation: झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज होती जा रही है. आदिवासी संगठनों की ओर से परिसीमन के संभावित असर को लेकर चिंता जताई जा रही है. राजनीतिक और सामाजिक बहस में इस बात पर चिंता सबसे अधिक जाहिर की जा रही है कि परिसीमन से आदिवासी सीटों का नुकसान होगा.

इसी बीच इंडियन रेवेन्यू सर्विस (IRS) की अधिकारी निशा उरांव ने परिसीमन को लेकर अपनी अलग राय सामने रखी है. उनका दावा है कि परिसीमन से झारखंड में आदिवासी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को नुकसान होने की आशंका नहीं है. उन्होंने कहा कि परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज में भय और भ्रम पैदा करने की कोशिश की जा रही है.

निशा उरांव लंबे समय से आदिवासी समाज से जुड़े विषयों पर अपनी बात रखती रही हैं. उन्होंने कहा कि सरकारी सेवा में रहते हुए भी वह सामाजिक मुद्दों पर बात करती हैं. उनके मुताबिक सर्विस कंडक्ट उन्हें राजनीति करने की अनुमति नहीं देता, लेकिन समाज से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखना राजनीति नहीं है.

परिसीमन पर क्या बोलीं निशा उरांव?

निशा उरांव का कहना है कि परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज के बीच एक तरह का डर पैदा किया जा रहा है. उनका दावा है कि केंद्र सरकार की ओर से परिसीमन पर जो संवैधानिक और सरकारी स्थिति स्पष्ट की गई है, उसके मुताबिक आदिवासी समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कम करने वाला कोई सीधा प्रावधान नहीं है. उन्होंने गृह मंत्रालय की ओर से परिसीमन से संबंधित उपलब्ध जानकारी का हवाला देते हुए कहा कि आदिवासी समाज को इस मुद्दे पर भ्रमित होने के बजाय वास्तविक प्रावधानों को समझना चाहिए.

2008 में क्यों टाला गया था झारखंड का परिसीमन?

झारखंड में परिसीमन का विवाद नया नहीं है. वर्ष 2007 में परिसीमन आयोग ने झारखंड के लिए परिसीमन से संबंधित आदेश जारी किए थे. इसके बाद 2008 में केंद्र सरकार ने कानून में संशोधन कर झारखंड से संबंधित उन परिसीमन आदेशों को कानूनी प्रभाव से बाहर कर दिया. इसके तहत उस समय लागू निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था को 2026 तक जारी रखने का प्रावधान किया गया.

साल 2008 के परिसीमन को लेकर सबसे बड़ी बहस जनसंख्या के आंकड़ों और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन को लेकर थी. आदिवासी पक्ष की ओर से यह आशंका जताई गई थी कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्निर्धारण का असर अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर पड़ सकता है. इसी संदर्भ में 28 से घटकर अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटें केवल 22 रह गई थीं. इसलिए तब भारी राजनीतिक विरोध के बीच इसे टाल दिया गया था.

हालांकि, आधिकारिक रिकॉर्ड यह स्पष्ट करता है कि 2008 के बाद झारखंड के लिए 2007 के परिसीमन आदेश को निष्प्रभावी कर दिया गया और पुरानी व्यवस्था को 2026 तक जारी रखा गया. बाद में वर्तमान व्यवस्था के तहत झारखंड में 81 विधानसभा सीटें और 28 अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए आरक्षित सीटें बनी रहीं.

परिसीमन पर अब फिर क्यों उठा सवाल?

संविधान में 84वें संशोधन के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभा की कुल सीटों के पुनर्समायोजन पर रोक को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ाया गया था. निर्वाचन आयोग यह भी स्पष्ट करता है कि मौजूदा निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक जारी रहने के लिए संवैधानिक प्रावधान मौजूद हैं. यही वजह है कि अब परिसीमन एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है. केंद्र सरकार ने 2026 में होने वाली जनगणना को लेकर प्रक्रिया आगे बढ़ाई है. गृह मंत्रालय के मुताबिक आगामी जनगणना में जाति की गणना भी शामिल की जाएगी. इसका मतलब यह कि आने वाले समय में जनसंख्या के नए आंकड़े सामने आने के बाद परिसीमन की प्रक्रिया का सवाल महत्वपूर्ण होगा. लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि झारखंड में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की अंतिम संख्या कितनी होगी.

परिसीमन पर केंद्र ने क्या किया?

केंद्र सरकार ने अप्रैल 2026 में परिसीमन बिल, 2026 और इससे जुड़े संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 लोकसभा में पेश किए थे. लेकिन संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला और 17 अप्रैल 2026 को वह पारित नहीं हो सका. इसके बाद संबंधित परिसीमन बिल भी आगे नहीं बढ़ पाया. इसका मतलब यह कि अभी परिसीमन का नया कानून संसद से पास होकर लागू नहीं हुआ है. प्रस्तावित व्यवस्था में लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्गठन का रास्ता तैयार करने की कोशिश की गई थी. हालांकि, 2026 के बाद परिसीमन को लेकर संवैधानिक प्रावधानों के कारण यह मुद्दा फिर चर्चा में है. झारखंड समेत कई राज्यों में संभावित राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर बहस तेज है.

28 एसटी सीटें बढ़कर 42 होने का दावा

झारखंड विधानसभा में वर्तमान में 81 सीटें हैं, जिनमें 28 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित हैं. निशा उरांव के मुताबिक यदि परिसीमन के दौरान कुल विधानसभा सीटों और एसटी आरक्षित सीटों में समान अनुपात में बढ़ोतरी होती है, तो 28 एसटी सीटें बढ़कर करीब 42 हो सकती हैं. निशा उरांव का तर्क है कि अगर कुल सीटों की संख्या बढ़ती है और एसटी आरक्षित सीटों में भी उसी अनुपात में वृद्धि होती है, तो आदिवासी समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी मौजूदा अनुपात के आसपास बनी रह सकती है. हालांकि, 42 एसटी सीटों का आंकड़ा फिलहाल निशा उरांव के तर्क और संभावित गणना पर आधारित है. इसे परिसीमन का आधिकारिक आंकड़ा नहीं माना जा सकता. अंतिम संख्या परिसीमन आयोग की प्रक्रिया और उसके निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी.

महाजुटान पर भी उठाए सवाल

परिसीमन के विरोध में 30 अगस्त को रांची के मोरहाबादी मैदान में प्रस्तावित आदिवासी महाजुटान को लेकर भी निशा उरांव ने सवाल उठाए हैं. उन्होंने दावा किया कि इस आयोजन को पूरे आदिवासी समाज का प्रतिनिधि आयोजन बताना उचित नहीं होगा. उन्होंने आरोप लगाया कि आयोजन के पीछे एक खास धार्मिक समुदाय के लोगों की भूमिका है. निशा उरांव के इस दावे पर महाजुटान के आयोजकों का पक्ष भी महत्वपूर्ण है. यदि आयोजक इस आरोप से असहमत हैं तो उनका पक्ष भी खबर का हिस्सा होना चाहिए.

क्या है परिसीमन का असली विवाद?

दरअसल, झारखंड में परिसीमन को लेकर सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि भविष्य में लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या तथा एससी-एसटी आरक्षित सीटों के स्वरूप में क्या बदलाव होगा. आदिवासी संगठनों को आशंका है कि जनसंख्या के आंकड़ों में बदलाव का असर एसटी आरक्षित सीटों पर पड़ सकता है. निशा उरांव का दावा है कि आदिवासी समाज को परिसीमन के नाम पर डरने की जरूरत नहीं है. उनका कहना है कि यदि कुल सीटों और एसटी सीटों में समान अनुपात में वृद्धि होती है, तो आदिवासी प्रतिनिधित्व कम होने के बजाय मौजूदा अनुपात में बना रह सकता है.

यही वजह है कि झारखंड में परिसीमन का मुद्दा अब सिर्फ चुनावी सीमाओं के पुनर्निर्धारण का विषय नहीं रह गया है. यह आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व, जनसंख्या के आंकड़ों और झारखंड की राजनीतिक संरचना से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है. फिलहाल, परिसीमन की अंतिम प्रक्रिया और सीटों के पुनर्गठन को लेकर आधिकारिक निर्णय सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि झारखंड की विधानसभा और लोकसभा सीटों की संख्या तथा एसटी आरक्षित सीटों में वास्तविक रूप से क्या बदलाव होता है.

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निशा उरांव का संदेश साफ- डर नहीं, प्रावधान समझिए

निशा उरांव का कहना है कि आदिवासी समाज को परिसीमन को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम से दूर रहना चाहिए. उनका दावा है कि उपलब्ध सरकारी प्रावधानों को समझने पर यह स्पष्ट होता है कि आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व के खत्म या बड़े पैमाने पर कम होने की बात अभी प्रमाणित नहीं है. अब सवाल यह है कि आगामी परिसीमन में झारखंड के आदिवासी प्रतिनिधित्व का वास्तविक गणित क्या होगा? इसका जवाब जनगणना के आंकड़े, संवैधानिक प्रावधान और परिसीमन आयोग के अंतिम फैसले से ही सामने आएगा.

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