आदिवासी एकता महाजुटान को चर्च या कांग्रेस की रैली बताना साजिश

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आदिवासी महाजुटान रैली मे पहुचे युवा / Prabhat Khabar Network

आदिवासी एकता महाजुटान रैली को चर्च या कांग्रेस प्रायोजित बताने वालों पर लक्ष्मीनारायण मुंडा ने निशाना साधा, कहा- यह आदिवासियों के अस्तित्व की लड़ाई है।

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प्रवीण मुंडा की रिपोर्ट

रांची. आदिवासी एकता महाजुटान रैली को पहले चर्च प्रायोजित और अब कांग्रेसी रैली बताने वाले लोगों पर सामाजिक कार्यकर्ता एवं रैली के आयोजन में शामिल लक्ष्मीनारायण मुंडा ने निशाना साधा है. उन्होंने कहा कि दोनों आरोप एक ही मानसिकता से निकलते हैं. इसका उद्देश्य आदिवासियों को धर्म और राजनीति के नाम पर बांटकर कमजोर रखना है.

आदिवासियों की आरक्षित सीटें घटाने के कथित प्रयास

लक्ष्मीनारायण मुंडा ने कहा कि रैली की घोषणा के समय ही स्पष्ट कर दिया गया था कि इसका उद्देश्य परिसीमन की आड़ में आदिवासियों की आरक्षित सीटें घटाने के कथित प्रयास के खिलाफ आवाज उठाना है. इसमें आदिवासी समुदाय के विभिन्न संगठनों, सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं और नेताओं ने संयुक्त रूप से भाग लिया. सभी राजनीतिक दलों से जुड़े आदिवासी नेताओं और कार्यकर्ताओं से भी रैली में शामिल होने की अपील की गयी थी. उन्होंने कहा कि यह किसी एक राजनीतिक दल या धर्म की रैली नहीं थी, बल्कि आदिवासी अस्तित्व और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आयोजित की गयी थी.

क्या ईसाई आदिवासी नहीं

श्री मुंडा ने कहा कि भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, वनवासी कल्याण केंद्र और हिंदूवादी संगठनों से जुड़े कुछ आदिवासी संगठनों के लोग रैली को चर्च प्रायोजित बता रहे हैं. उनका तर्क है कि रैली में ईसाई आदिवासी शामिल हुए, इसलिए यह ईसाई रैली है. उन्होंने सवाल किया कि क्या चर्च जाने वाले ईसाई आदिवासी, आदिवासी नहीं हैं. उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की धार्मिक आस्था के आधार पर उसकी आदिवासी पहचान को नकारा नहीं जा सकता.

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आदिवासी पहचान का आधार धर्म नहीं

लक्ष्मीनारायण मुंडा ने कहा कि भारतीय संविधान में अनुसूचित जनजाति की पहचान का आधार धर्म नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जनजातियों को अधिसूचित करने की व्यवस्था है. उन्होंने कहा कि जनजातीय पहचान के संदर्भ में 1965 की लोकुर समिति द्वारा बताये गये प्रमुख मानकों में आदिम लक्षण, विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, संकोच और पिछड़ापन शामिल हैं. इनमें धर्म को आधार नहीं बनाया गया है.

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को धर्म और राजनीतिक दलों के आधार पर बांटने के बजाय उसके संवैधानिक अधिकारों और अस्तित्व से जुड़े मुद्दों पर एकजुट होना जरूरी है.

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