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My Mati: असहयोग आंदोलन में सालकाठोनी चाय बागान के प्रेमचंद भूमिज

Updated at : 26 Aug 2022 12:12 PM (IST)
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My Mati: असहयोग आंदोलन में सालकाठोनी चाय बागान के प्रेमचंद भूमिज

बिरसा भूमिज असम प्रदेश तक पहुंच गये थे. रेल पटरी बिछाने का काम समाप्त हो जाने पर बिरसा भूमिज चाय बागान में काम करना शुरू किये. तभी से उनका परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी सालकाठोनी चाय बागान में काम करते आ रहा है. बिरसा भूमिज के असम में बस जाने के कारण उनका अपने भाई और परिवार से संपर्क छूट गया.

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मांय माटी: जिन दिनों कोलकाता और असम को जोड़ने के लिए रेल पटरियां बिछाई जा रही थी, तभी रेल पटरी बिछाने का काम करते-करते प्रेमचंद भूमिज के पिता बिरसा भूमिज असम प्रदेश तक पहुंच गये थे. रेल पटरी बिछाने का काम समाप्त हो जाने पर बिरसा भूमिज चाय बागान में काम करना शुरू किये. तभी से उनका परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी सालकाठोनी चाय बागान में काम करते आ रहा है. बिरसा भूमिज के असम में बस जाने के कारण उनका अपने भाई और परिवार से संपर्क छूट गया.

बिरसा के पुत्र प्रेमचंद भूमिज किशोरावस्था से ही परिवार के अन्य सदस्योंं की तरह ही चाय बागान में मजदूरी करते थे. शुरू में तो वह एक साधारण बागान मजदूर थे, जो चाय की पत्तियां तोड़ना, कलम काटना, नाला खोदना, नाला साफ करना जैसे काम किया करते थे. काम के प्रति लगन को देखते हुए उन्हें प्रोमोशन मिला और वह चाय फैक्ट्री के हेड फिटर बन गयेे. अन्य बागानिया परिवार की तरह ही उनके परिवार के जीने का आधार भी चाय बागान ही था. प्रेमचंद भूमिज एक अच्छे फुटबॉल भी खिलाड़ी थे. उन्हें शिक्षा प्राप्त करने का विशेष अवसर नहीं मिला था, परंतु अपनी कोशिशों से वह असमी और अंग्रेजी भाषा के अक्षरों से परिचित हो गये थे. वह दृढ़ स्वभाव के एक विचारशील व्यक्ति थे. वह समाज में व्याप्त अंधविश्वास का विरोध करते थे.

प्रेमचंद भूमिज होश संभालने के साथ ही असम के चाय बागानों मे काम करने वाले मजदूरों का अंग्रेजों द्वारा शोषण देखते हुए बड़े हो रहे थे. अंग्रेज साहब के आगे कोई चाय मजदूर छतरी खोल के नहीं पार हो सकता था, साइकिल नहीं चढ़ सकता था और टोपी नहीं पहन सकता था. बागान में काम की कोई निर्धारित समय-सीमा भी नहीं थी. काम न करने पर, बातें न सुनने पर डंडे से गरीब मजदूरों को मारा जाता था. यदि किसी भी तरह की शिकायत जैसे– मजदूरों के रहने के घर से पानी टपकना, बीमार होने पर काम पर न जाने की सूचना देने के लिए बागान मैनेजर (अंग्रेज साहब) के पास जाना होता था तो सर झुकाकर खिड़की से दूर खड़े होकर ही अपनी बातें बतानी पड़ती थी. अधिकांश चाय बागान के साहब के बंगले में उनके आदेशानुसार उस बागान की सुंदर लड़कियों को घरेलू काम करने लिए जाना पड़ता था, जहां उनका शारीरिक और मानसिक शोषण होता था. अपने लोगों की यह दुर्दशा देखकर प्रेमचंद का हृदय रोता था. इसी कारण अंग्रेजों के प्रति उनके मन में क्रोध और घृणा भरी रहती थी.

देश में आजादी आंदोलन जोरों पर था. यह शहरों तक सीमित था. गांधी जी ने इस आंदोलन को गांवों-कस्बों तक पहुंचा दिया. गांधी जी के आह्वान पर हर तबके के लोगों आजादी आंदोलन में अपना योगदान देने लगे. आजादी आंदोलन की यह लहर जब असम के चाय बागान तक पहुंची तो वर्षों से प्रेमचंद भूमिज के मन में अंग्रेजी शासन व्यवस्था के प्रति दबी नफरत ऊफान मारने लगी. वह गांधीजी के आह्वान पर असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लेने लगे.

उन दिनों असम में भी जगह-जगह पर आजादी आंदोलन के स्वयंसेवकों को संगठित और गुप्त रूप से प्रशिक्षित किया जा रहा था. सभी ओर जुलूसों का लगातार आयोजन भी हो रहा था. प्रेमचंद भूमिज अपने साल काठोनी चाय बागान के साथ ही आसपास के बागानों के मजदूरों को संगठित करके जूूलूसों और सभाओं का आयोजन करने लगे और अपने क्षेत्र में आंदोलन को नेतृत्व करने लगे. प्रतिदिन आंदोलन में उनकी भागीदारी बढ़ने लगी थी. प्रेमचंद भूमिज अब साल काठोनी चाय बागान क्षेत्र में अंग्रेजों के लिए परेशानी का सबाब बन गये थे. चाय बागान के मजदूर जो अंग्रेज साहबों को सर झुका के अब तक आते-जाते सलाम करते थे. आज उनकी सत्ता को ही उखाड़ फेंकने के लिए नारा बुलंद कर रहे थे. भला अंग्रेजों को ये कैसे सुहाता?

19 सितंबर 1942 को प्रेमचंद भूमिज को गिरफ्तार करके अंग्रेज पुलिस ने शिवसागर जेल में बंद कर दिया. सुनवाई की प्रक्रिया चली. 26 अक्टूबर 1942 को उन्हें दो साल की सजा सुनायी गयी. सजा सुनाने के बाद उन्हें शिवसागर जेल से तेजपुर (दोरांग) जेल में चालान कर दिया गया. उन्होंने दिसंबर 1942 से नवंबर 1944 तक जेल की सजा काटी. जेल से निकलने के बाद भी वह अगले दो साल तक भूमिगत रहकर स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों में सक्रिय रहे.

आजादी के बाद भी वह चायबागान में काम करते हुए परिवार, समुदाय और देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करते रहे. वर्ष 1972 में असम सरकार की ओर से प्रेमचंद भूमिज को स्वतंत्रता सेनानी के रूप में स्वीकृति देकर एक प्रमाण पत्र प्रदान दिया गया. वर्ष 2004 की 20 जुलाई को शारीरिक अस्वस्थता के कारण उनकी मृत्यु हो गयी. हर तरह के शोषण, जुल्म व अत्याचार के खिलाफ लड़ने वालों के लिए प्रेमचंद भूमिज का जीवन आज भी प्रेरणा का अमिट स्रोत है.

(सहायक प्राध्यापक, काशी साहु कॉलेज, सरायकेला)

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