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आदिवासी दर्शन में कोई सर्वशक्तिशाली देवता नहीं, किताब उत्सव में बोले डॉ इकिर गुंजल मुंडा

Updated at : 22 Dec 2023 11:34 PM (IST)
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आदिवासी दर्शन में कोई सर्वशक्तिशाली देवता नहीं, किताब उत्सव में बोले डॉ इकिर गुंजल मुंडा

इतिहासकार प्रो इंद्र कुमार चौधरी और आलोचक अशोक प्रियदर्शी ने उनके जीवन और व्यक्तित्व पर अपने विचार रखे. डॉ राम दयाल मुंडा जनजातीय शोध कल्याण संस्थान के निदेशक रणेंद्र ने कहा कि हिंदी अदब के लेखक प्रेमचंद भी राधाकृष्ण की अफसाना निगारी से मुतासिर थे.

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आदिवासी दर्शन में कोई सर्वशक्तिशाली देवता नहीं है. यहां सभी का समान महत्व है. आदिवासी समाज में हाशिए पर जा चुके लोगों को भी समान स्थान मिलता है. ये बातें डॉ इकिर गुंजल मुंडा ने कहीं. वह किताब उत्सव के पांचवें दिन ‘आदिवासी समाज से हम क्या सीख सकते हैं?’ विषय पर बोल रहे थे. इस सत्र को डॉ इकिर गुंजल मुंडा के अलावा रवि भूषण और राकेश रंजन उरांव ने भी संबोधित किया. प्रो रवि भूषण ने कहा कि सादा जीवन और उच्च विचार आदिवासियों की खासियत है. हमें आदिवासी समाज से सहजता, सरलता, सामुदायिकता और सहजीविता सीखना चाहिए. राकेश रंजन उरांव ने आदिवासी समाज की संरचना को विभिन्न स्तर पर देखने का प्रयास किया. किताब उत्सव के पांचवें दिन ‘हमारा झारखंड हमारा गौरव’ सत्र में झारखंड के गौरव विचारक-कथाकार राधाकृष्ण को याद किया गया. इतिहासकार प्रो इंद्र कुमार चौधरी और आलोचक अशोक प्रियदर्शी ने उनके जीवन और व्यक्तित्व पर अपने विचार रखे. डॉ राम दयाल मुंडा जनजातीय शोध कल्याण संस्थान के निदेशक रणेंद्र ने कहा कि हिंदी अदब के लेखक प्रेमचंद भी राधाकृष्ण की अफसाना निगारी से मुतासिर थे. एक बस कंडक्टर रहते राधाकृष्ण ने जो कहानियां लिखीं, वो हिंदी अदब की सबसे खूबसूरत कहानियां हैं. कहानीकार राधाकृष्ण सिर्फ झारखंड के गौरव नहीं हैं, बल्कि वो हिंदी अदब के चमकते हुए सितारे के रूप में पूरे देश के गौरव हैं.

कोयले की खान में हीरा के समान थे राधाकृष्ण

प्रो इंद्र कुमार चौधरी ने कहा हिंदी कि अदब के कोयले की खान में हीरा के समान थे अफसाना नवीस राधाकृष्ण. वो एक कहानीकार, पटकथा लेखक, संपादक और सामाजिक तहरीक से जुड़े व्यक्ति थे. प्रो अशोक प्रियदर्शी ने कहा कि जब राधाकृष्ण को बिहार सरकार की सरकारी पत्रिका और एक आदिवासी पत्रिका में से किसी एक में संपादक बनने का मौका मिला, तो उन्होंने आदिवासी पत्रिका को चुना. उनके भीतर हिंदी साहित्य के लेखक होते हुए भी जनजातीय भाषाओं को लेकर निस्वार्थ प्यार था. आदिवासी किरदारों का चित्रण उन्होंने जितनी मार्मिकता और करुणा से किया है, वो आज के आदिवासी लेखकों की लेखनी में देखने को नहीं मिलती.

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विभाजन और विस्थापन को बयां करता है ‘आलोकुठी’

विजय गौड़ के उपन्यास ‘आलोकुठी’ पर केंद्रित सत्र में प्रमोद कुमार झा, रश्मि शर्मा, राकेश कुमार सिंह मौजूद थे. रश्मि शर्मा ने कहा किसी भी कृति के बारे में यह बात महत्वपूर्ण है कि वह समाज के किस धड़े के साथ खड़ा है. जुल्म करने वाले के साथ या जिन पर जुल्म ढाया जा रहा है, उसके साथ. यह उपन्यास बंगाल विभाजन के बाद हुए आदिवासी नरसंहार की सच्ची घटना को बहुत ही मार्मिकता से बयान करता है. प्रमोद कुमार झा ने कहा कि इतिहास से बाहर कर दिए गए वीभत्स घटना को साहित्यिक कृति के जरिए लेखक विजय गौड़ ने दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया है. आलोकुठी उपन्यास विभाजन के दर्द और विस्थापन के दंश का उपन्यास है.

‘हमारा झारखंड हमारे गौरव’ में याद किए जाएंगे फादर कामिल बुल्के

राकेश कुमार सिंह ने उपन्यास का आलोचनात्मक विश्लेषण करते हुए कहा कि इसमें सभी पात्र काफी रोचक हैं. मगर लेखक का बंगाली समाज से न होना उनकी भाषाई कमी को दर्शाता है. 23 दिसंबर (शनिवार) को कार्यक्रम के ‘हमारा झारखंड हमारे गौरव’ सत्र में फादर कामिल बुल्के को याद किया जाएगा. दूसरे सत्र में मल्ली गांधी की पुस्तकों के लोकार्पण के साथ ही ‘विमुक्त जनजातियां : हाशिए की अनसुनी आवाजें’ विषय पर बातचीत होगी. तीसरे सत्र में ‘आदिवासी साहित्य की भाषिक संरचना’ विषय पर परिचर्चा होगी.

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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