स्कूल चलाने वाली कल्पना सोरेन कैसे बनीं झारखंड की जननायक? दिवंगत मंत्री सुदिव्य सोनू ने खोला था पूरा राज

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बाईं तरफ सुदिव्य सोनू और दाईं तरफ कल्पना सोरेन की फाइल फोटो

जानें कैसे हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन, जो राजनीति से दूर थीं, सुदिव्य सोनू की मदद से गांडेय उपचुनाव में विजयी हुईं. इस लेख में उस असाधारण राजनीतिक सफर की पूरी कहानी पढ़ें.

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रांची : कहा जाता है मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन को गांडेय विधानसभा से जीत दिलाने के लिए कड़ी मेहनत की थी. उनकी रणनीति का ही कमाल था कि कल्पना सोरेन ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अनुपस्थिति में जबरदस्त जीत दर्ज की थी. अब जब वे नहीं रहे तो हम आपको उस वक्त की पूरी इनसाइड स्टोरी बताएंगे जो उन्होंने खुद एक निजी यू-ट्यूब चैनल से खास बातचीत में बताई थी. उस साक्षात्कार में सुदिव्य सोनू ने खुद उस घटनाक्रम का खुलासा किया था कि कैसे संकोच और डर से घिरीं कल्पना सोरेन को उन्होंने राजनीति में आगे बढ़ाया और किस तरह गांडेय उपचुनाव के जरिए उनका ऐतिहासिक राजनीतिक डेब्यू हुआ.

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पूजा करके की थी कल्पना ने राजनीति की शुरुआत

सुदिव्य सोनू ने बताया था कि जब बजट सत्र चल रहा था और हेमंत सोरेन जेल में थे, तब उन्हें संदेश मिला कि कल्पना सोरेन उनसे मिलना चाहती हैं. 1 मार्च को जब मुलाकात हुई, तो कल्पना सोरेन संकोच में थीं. उन्होंने सुदिव्य सोनू से पूछा कि आखिर उन्हें ही राजनीति में क्यों उतारा जा रहा है, जबकि वे अपना स्कूल चलाकर और हेमंत सोरेन की पत्नी के रूप में ही खुश हैं. तब सुदिव्य सोनू ने उन्हें सलाह देते हुए समझाया कि "पति के खिलाफ हुई कार्रवाई से उत्पन्न सहानुभूति केवल पत्नी को मिल सकती है, भाई या किसी अन्य रिश्तेदार को नहीं." राजनीति में कदम रखने से पहले डरी हुई कल्पना सोरेन ने मंदिर जाने की इच्छा जताई. 4 मार्च को उनके औपचारिक राजनीतिक लॉन्च से पहले सुदिव्य सोनू उन्हें पारसनाथ स्थित आदिवासी धर्म स्थल 'दिशोम जाहेर थान' और स्थानीय लोगों के आराध्य 'भूमिया जी भगवान' के मंदिर ले गए, जहां उन्होंने आशीर्वाद लिया.

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25 हजार की भीड़ देख रुंध गया था कल्पना गला

राजनीतिक सफर की पहली ही जनसभा में जब कल्पना सोरेन मंच पर पहुंचीं, तो सामने 25 हजार लोगों की विशाल भीड़ देखकर वे भावुक हो गईं. बोलते-बोलते उनका गला रुंध गया और भाषण थम सा गया. उस नाजुक मोड़ पर मंच पर मौजूद सुदिव्य सोनू ने तुरंत स्थिति को संभाला. उन्होंने झामुमो का वह पुराना ऐतिहासिक नारा माइक पर गूंजाना शुरू कर दिया जो कभी दिशोम गुरु शिबू सोरेन के दौर में लगता था- "जेल का ताला टूटेगा, हेमंत सोरेन छूटेगा." इस नारे से पूरा मैदान गूंज उठा और लगभग 40 सेकंड के भीतर कल्पना सोरेन ने खुद को संभाला व अपना संबोधन शुरू किया. सुदिव्य सोनू इसे कल्पना सोरेन के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट मानते थे.

इंदिरा गांधी से की थी तुलना तो हंस पड़ी थीं कल्पना

सुदिव्य सोनू ने इंटरव्यू में कल्पना सोरेन के महिला समर्थकों के बीच लोकप्रियता की तुलना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से की थी. उन्होंने याद किया कि 1984 में जब वे 14-16 वर्ष के थे, तब उन्होंने पूर्णिया में इंदिरा गांधी की जनसभा में महिलाओं का भारी हुजूम देखा था. ठीक वैसा ही आकर्षण गांडेय और पूरे झारखंड में कल्पना सोरेन के प्रति देखने को मिला. जब सुदिव्य सोनू ने कल्पना सोरेन से यह बात बताई, तो उन्होंने हंसते हुए कहा था- "क्या भैया, चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं." सुदिव्य सोनू ने उस खास पॉडकास्ट में कहा था कि एक सेना परिवार की पृष्ठभूमि और केंद्रीय विद्यालय की छात्रा होने के कारण कल्पना सोरेन बहुभाषी और प्रखर वक्ता हैं, जो आज राज्य की एक मजबूत नेता के रूप में स्थापित हो चुकी हैं.

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