झारखंड हाईकोर्ट ने शिव शंकर शर्मा की रिव्यू याचिका खारिज की, 50 हजार का जुर्माना बरकरार

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झारखंड हाईकोर्ट.

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने शिव शंकर शर्मा की रिव्यू याचिका खारिज कर दी. अदालत ने कहा कि जनहित याचिका की आड़ में न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग स्वीकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने 50 हजार रुपये का जुर्माना भी बरकरार रखा और राहत देने से साफ इनकार कर दिया.

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रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने जनहित याचिकाकर्ता शिव शंकर शर्मा को बड़ा झटका देते हुए उनकी सिविल रिव्यू याचिका खारिज कर दी है. मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि याचिकाकर्ता अपनी रिव्यू याचिका में ऐसा कोई तथ्य या कानूनी त्रुटि नहीं दिखा सके, जिसके आधार पर 9 मई 2025 को पारित फैसले की समीक्षा की जा सके. अदालत ने पूर्व में लगाए गए 50 हजार रुपये के जुर्माने को भी बरकरार रखा.

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पहले के फैसले पर उठाई थी आपत्ति

शिव शंकर शर्मा ने हाईकोर्ट के उस फैसले की समीक्षा की मांग की थी, जिसमें उनकी जनहित याचिका (पीआईएल) को न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग बताते हुए खारिज कर दिया गया था. उन्होंने विशेष रूप से फैसले के पैरा 32 और 36 पर आपत्ति जताई थी, जहां अदालत ने उनकी विश्वसनीयता (क्रेडेंशियल्स) पर सवाल उठाए थे और कहा था कि याचिका दुर्भावनापूर्ण मंशा से दायर की गई थी. साथ ही उन पर लगाए गए 50 हजार रुपये के जुर्माने को भी हटाने की मांग की गई थी.

याचिकाकर्ता ने क्या दलील दी

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने तर्क दिया कि जनहित याचिका दायर होने के शुरुआती चरण में ही याचिकाकर्ता की पात्रता और विश्वसनीयता की जांच हो चुकी थी. इसलिए कई वर्षों तक सुनवाई चलने के बाद दोबारा उनकी साख पर सवाल उठाना उचित नहीं है. उनका कहना था कि याचिका में आवश्यक तथ्यों का उल्लेख किया गया था और अदालत को उनकी मंशा पर संदेह नहीं करना चाहिए था.

हाईकोर्ट ने दलीलों को किया खारिज

खंडपीठ ने इन दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि रिव्यू याचिका में उठाए गए किसी भी आधार से यह साबित नहीं होता कि मूल फैसले में कोई स्पष्ट कानूनी त्रुटि हुई थी. अदालत ने यह भी पाया कि मूल जनहित याचिका में याचिकाकर्ता ने अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए पर्याप्त तथ्य प्रस्तुत नहीं किए थे. केवल यह कहना कि उनका कोई निजी हित नहीं है, किसी व्यक्ति को स्वतः जनहित याचिका दायर करने का अधिकार नहीं देता.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2022 के उसी मामले का उल्लेख किया, जिसमें शिव शंकर शर्मा की ओर से दायर एक अन्य जनहित याचिका पर भी सवाल उठाए गए थे. सर्वोच्च न्यायालय ने तब कहा था कि याचिकाकर्ता की लोकस स्टैंडी संदिग्ध है और उन्होंने न्यायालय का दरवाजा साफ नीयत से नहीं खटखटाया. हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी वर्तमान मामले में भी प्रासंगिक है और इससे यह स्पष्ट होता है कि याचिकाकर्ता पहले भी न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग कर चुके हैं.

जुर्माने से भी नहीं मिली राहत

अदालत ने कहा कि जब मूल फैसले में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं पाई गई, तो 50 हजार रुपये के जुर्माने को हटाने का भी कोई आधार नहीं बनता. कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता ने जुर्माने की राशि समय पर जमा नहीं की और रिव्यू याचिका लंबित रहने का लाभ उठाकर भुगतान टालते रहे. इसे भी अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया के प्रति निष्पक्ष आचरण के विपरीत माना.

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अदालत की सख्त टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि जनहित याचिका एक महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था है, लेकिन इसका उपयोग निजी स्वार्थ, दबाव बनाने या अधिकारियों को ब्लैकमेल करने के लिए नहीं किया जा सकता. ऐसे मामलों पर सख्ती जरूरी है ताकि जनहित याचिकाओं की विश्वसनीयता बनी रहे. इन सभी तथ्यों को देखते हुए अदालत ने रिव्यू याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया और किसी अतिरिक्त लागत का आदेश नहीं दिया.

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