झारखंड में हेपेटाइटिस बी संक्रमण घटा, लेकिन हेपेटाइटिस सी ने बढ़ाई चिंता

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कार्यक्रम में शामिल लोग

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झारखंड में हेपेटाइटिस बी संक्रमण दर में कमी आई है, लेकिन हेपेटाइटिस सी के बढ़ते मामले चिंता का विषय बने हुए हैं. स्वास्थ्य विभाग ने 2030 तक हेपेटाइटिस उन्मूलन का लक्ष्य रखा है.

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बिपिन सिंह

झारखंड में हेपेटाइटिस बी (एचबीवी) संक्रमण दर में कमी दर्ज की गई है, लेकिन हेपेटाइटिस सी (एचसीवी) के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा ने कहा कि राज्य में एचबीवी की पॉजिटिविटी दर 3.36 प्रतिशत से घटकर 1.58 प्रतिशत हो गई है, जो स्वास्थ्य कार्यक्रमों की सफलता का संकेत है. वहीं, एचसीवी संक्रमण दर 0.14 प्रतिशत से बढ़कर 0.64 प्रतिशत तक पहुंच गई है. मंगलवार को राजधानी में विश्व हेपेटाइटिस दिवस के अवसर पर आयोजित जागरूकता कार्यशाला में चिकित्सा पदाधिकारियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सरकार वर्ष 2030 तक हेपेटाइटिस उन्मूलन के लक्ष्य को लेकर प्रतिबद्ध है. उन्होंने कहा कि हेपेटाइटिस बी के मामलों में कमी राहत देने वाली है, लेकिन हेपेटाइटिस सी के बढ़ते मामलों को नियंत्रित करना अब प्राथमिकता होगी.

पांचों प्रमंडलों में होगी वायरल लोड जांच की सुविधा

कार्यक्रम में राज्य नोडल पदाधिकारी डॉ कमलेश कुमार ने बताया कि राज्य के सभी पांच प्रमंडलों में हेपेटाइटिस वायरल लोड जांच के लिए ट्रूनेट मशीन उपलब्ध कराई जा रही है. इससे मरीजों की जांच और उपचार में तेजी आएगी. रिम्स माइक्रोबायोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ मनोज कुमार ने हेपेटाइटिस की वैज्ञानिक जांच और उपचार पद्धति पर विस्तृत प्रस्तुति दी. मौके पर राज्य महामारी विशेषज्ञ डॉ प्रवीण कर्ण, रांची सिविल सर्जन डॉ प्रभात कुमार, सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ विमलेश सिंह सहित कई विशेषज्ञ मौजूद थे.

हेपेटाइटिस सी के 99 प्रतिशत मामलों का इलाज संभव

रिम्स मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ अजित डुंगडुंग ने कहा कि हेपेटाइटिस सी के लगभग 99 प्रतिशत मामलों का सफल उपचार संभव है. वहीं, हेपेटाइटिस बी के अधिकांश मरीजों को दवा की आवश्यकता नहीं पड़ती, लेकिन करीब पांच प्रतिशत मामलों में यह क्रॉनिक बीमारी का रूप ले सकती है, जिसके लिए लंबे समय तक इलाज जरूरी होता है. उन्होंने कहा कि क्रॉनिक हेपेटाइटिस के मरीजों में शुरुआती चरण में लक्षण दिखाई नहीं देते और कई बार बीमारी का पता तब चलता है, जब लीवर को गंभीर नुकसान पहुंच चुका होता है.

जांच बढ़ने से सामने आ रहे अधिक मरीज

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार भारत में करीब चार करोड़ लोग हेपेटाइटिस बी और लगभग 60 लाख लोग हेपेटाइटिस सी से प्रभावित हैं. राज्य में वर्ष 2017 से जून 2026 तक हेपेटाइटिस बी की कुल 2,94,411 जांच की गई है. स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि जांच का दायरा बढ़ने से संक्रमण के अधिक मामले सामने आ रहे हैं.

लीवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है हेपेटाइटिस

हेपेटाइटिस लीवर में होने वाली सूजन है, जो मुख्य रूप से वायरस संक्रमण के कारण होती है. इसके पांच प्रमुख प्रकार ए, बी, सी, डी और ई हैं. इनमें हेपेटाइटिस बी और सी अधिक गंभीर माने जाते हैं, क्योंकि लंबे समय तक शरीर में रहने पर ये लीवर सिरोसिस, लीवर फेलियर और लीवर कैंसर का कारण बन सकते हैं.

दूषित पानी और संक्रमित रक्त से फैलती है बीमारी

हेपेटाइटिस ए और ई दूषित भोजन तथा पानी से फैलते हैं. वहीं, हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमित रक्त, असुरक्षित इंजेक्शन, संक्रमित सुई, बिना जांच के रक्त चढ़ाने, असुरक्षित यौन संबंध और संक्रमित मां से नवजात शिशु में फैल सकते हैं.

इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें

हेपेटाइटिस के शुरुआती चरण में अक्सर स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते. बाद में बुखार, अत्यधिक थकान, भूख कम लगना, मतली, उल्टी, पेट के दाहिने हिस्से में दर्द, गहरे रंग का पेशाब तथा आंखों और त्वचा का पीला पड़ना इसके प्रमुख लक्षण हो सकते हैं.

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अमलेश नंदन सिन्हा

लेखक के बारे में

By अमलेश नंदन सिन्हा

अमलेश नंदन सिन्हा प्रभात खबर डिजिटल में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता में 20 से अधिक वर्षों का अनुभव है. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद से इन्होंने कई समाचार पत्रों के साथ काम किया. इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत रांची एक्सप्रेस से की, जो अपने समय में झारखंड के विश्वसनीय अखबारों में से एक था. एक दशक से ज्यादा समय से ये डिजिटल के लिए काम कर रहे हैं. झारखंड की खबरों के अलावा, समसामयिक विषयों के बारे में भी लिखने में रुचि रखते हैं. विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा के बारे में देखना, पढ़ना और नई जानकारियां प्राप्त करना इन्हें पसंद है.

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