झारखंड : नहाय खाय के साथ लोक आस्‍था का महापर्व छठ शुरू, सोमवार को खरना

By Prabhat Khabar Digital Desk
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रांची :भगवान भास्‍कर की आराधना का चार दिवसीय महापर्व छठ की शुरुआत आज नहाय खाय के हुई है. राजधानी रांची समेत पूरे प्रदेश में नदियों, तालाबों और घर के कुओं पर छठ व्रतियों ने इस महापूजन की शुरुआत हो गयी है. व्रतियों ने नहाय खाय के साथ चार दिवसीय इस उपासना की शुरुआत की. नहाय खाय के दिन प्रसाद के रूप में कद्दू-चावल ग्रहण कर लोगों के बीच भी प्रसाद के रूप में वितरित किया गया.

स्नान करने का बाद व्रतियों ने भगवान सूर्य की आराधना की और अपने हाथों से चावल कद्दू का प्रसाद तैयार किया. प्रसाद तैयार करते समय शुद्घता का विशेष ध्‍यान रखा गया. इस दौरान व्रती छठ के गीत भी गुनगुना रहे थे. चारों ओर छठ के गीत गूंज रहे हैं. छठ के गीत से पूरा माहौल भक्तिमय हो गया है.

कार्तिक माह में मनाये जाने वाला लोक आस्था का महापर्व छठ का हिंदू धर्म में एक विशेष और अलग स्थान है. इस पर्व में सूर्य की उपासना होती है. मान्‍यता है कि शुद्धता व पवित्रता के साथ इस व्रत को करने वाले और इसमें सहयोग करने वालों की हर मनोकामना पूर्ण होती है. नहाय खाय के साथ शुरू हुआ यह व्रत चौथे दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्‍य देने के साथ पूर्ण होता है.

आपको बता दें कि सोमवार को छठ व्रती खरना पूजा करेंगे. इस दिन गन्‍ने के रस और चावल से तैयार खीर और घी चुपड़ी हुई रोटी का भोग लगाया जाता है और पूजन के बाद उसे ही प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है. इस दिन व्रती दिनभर उपवास करने के बाद शाम को अपने हाथों से प्रसाद तैयार करते हैं और भगवान को भोग लगाने के बाद उसे ग्रहण करते हैं. प्रसाद के रूप में खीर का वितरण श्रद्धालुओं के बीच किया जाता है.

खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रतियों का सबसे कठोर व्रत 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू हो जाता है. खरना के दूसरे दिन अस्‍ताचलगामी सूर्य को अर्घ्‍य दिया जाता है. पुन: अगले दिन सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्‍य देने के बाद व्रतियों का यह व्रत पूर्ण होता है. उसके बाद व्रती पारण करते हैं. इन चार दिनों में सफाई और शुद्धता का विशेष ध्‍यान रखा जाता है.

व्रती ऐसे करते हैं खरना

सोमवार, 12 नवंबर को खरना (लौहंडा) है. इस दिन व्रती प्रात:काल स्नानादि कर व्रत के निमित्त उपयोग में आने वाले पात्रों की सफाई करती हैं. जिस स्थान पर खरना किया जायेगा उसकी सफाई भी की जाती है. दिनभर निर्जला रहते हुए नवीन व स्वच्छ वस्त्र धारण कर श्रद्धा के साथ आम लकड़ी से विभिन्न प्रकार के महाप्रसाद (अरवा चावल, गुड़, गाय दूध से खीर, गेहूं की रोटी) बनाते हैं.

उपयुक्त मुहूर्त पर सूर्य देव व छठी मैया का आह्वान किया जाता है. एकांत में बनाये व्यंजन अर्पित किया जाता है. कुल देवी-देवता को भी अर्पण किया जाता है. परिजनों, मित्रजनों के मध्य बांटा जाता है. खरना के दिन व्रती जल व प्रसाद ग्रहण करती हैं. इसके बाद पारन के दिन ही जल-अन्न ग्रहण करती हैं.

पहला अर्घ्य 13 को

मंगलवार, 13नवंबर को अस्ताचलगामी सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित किया जायेगा. व्रती ब्रह्म मुहूर्त से पूर्व स्नानादि कर परिजनों के साथ विभिन्न प्रकार के पकवान जैसे ठेकुआ, लड़ुआ आदि बनाने में जुट जाती हैं. दिन के तीसरे प्रहर में सूप अथवा डाला में पकवान सजाया जाता है. व्रती छठी मैया के गीत गाते हुए नदी घाट पहुंचते हैं. वहां विधिवत सूर्यदेव और छठी मैया की पूजा की जाती है. अस्त होते सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है.

अस्ताचलगामी सूर्य देव को अर्घ्य के लिए शुभ मुहूर्त : 3:29 से 5:00 बजे.

सर्वोत्तम मुहूर्त 4:24 से 5:00 बजे.

उदीयमान सूर्यदेव को अर्घ्य : सुबह 5:59 से 7:35 बजे के बीच दें अर्घ्य.

साथ ही सुबह 8:43 बजे से पहले पारन कर लेना है.

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