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अहंकार और घमंड पतन का कारण : जीयर स्वामी

Updated at : 19 Jul 2024 9:33 PM (IST)
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अहंकार और घमंड पतन का कारण : जीयर स्वामी

निगम क्षेत्र के सिंगरा अमानत नदी तट पर चातुर्मास व्रत कथा

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मेदिनीनगर. निगम क्षेत्र के सिंगरा अमानत नदी तट पर चातुर्मास व्रत कथा में श्रीत्रिदंडी लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी जी महाराज ने कहा कि सच बोलना चाहिए, लेकिन वही सच जो सबको प्रिय हो. वैसा सच नही बोलें, जो सबके लिए हानिकारक हो. झूठ भी मत बोलो, जो सबको प्रिय हो. यही सनातन धर्म की पहचान है. कब कहां किस बात को बोलना है, इस पर विचार कर ही बोलना चाहिए. शब्दों का चयन बहुत सोच-समझकर किया जाना चाहिए. परिस्थिति कैसी भी हो, समझदारी से किया गया बर्ताव हमेशा आपको अच्छा इंसान बनाता है. महाभारत युद्ध से कई तरह की सीख मिलती है. इन्हीं में से एक है किसी का अपमान नहीं करना चाहिए. क्योंकि वक्त बदलने में देर नहीं लगती. किसी का अपमान करना आपके संस्कारों को भी दिखाता है. अगर आप छोटी सी बात पर अहंकार दिखाते हुए अपमानित करेंगे तो फिर लोग भी बदला लेंगे ही. इसलिए समझदारी इसी में है कि आप एक अच्छे इंसान की तरह बर्ताव करें.

महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास के नाम से विख्यात हुए :

स्वामी जी ने भागवत कथा में कहा कि द्वैपायन जी का द्वीप पर जन्म हुआ था. उनके परदादा श्री गुरु वशिष्ठ जी ने उनका नाम कृष्ण द्वैपायन रखा. ये वशिष्ठ ऋषि के प्रपौत्र, शक्ति मुनि के पौत्र और पराशर मुनि के पुत्र हैं. पराशर जी ने कहा कि केवल मेरे शिष्य ही मेरे साथ जा सकते हैं. द्वैपायन ने कहा, तो मुझे अपना शिष्य बना लीजिए. पराशर जी ने फिर कहा तुम अभी बच्चे हो. तुम्हारी उम्र महज छह साल है. अपनी मां के साथ थोड़ा और समय बिताओ. द्वैपायन बोले, नहीं मैं चलना चाहता हूं. आप अभी मुझे अपना शिष्य बना लीजिए और मैं आपके साथ चलूंगा. पराशर के सामने कोई चारा नहीं था. छह साल के बच्चे को उन्होंने ब्रह्मचर्य में प्रवेश कराया उसे अपना शिष्य बनाया और फिर मुंडे हुए सिर और भिक्षा के कटोरे के साथ वह बच्चा अपने पिता या कहें कि गुरु के पीछे चल दिया. वही महर्षि कृष्ण द्वैपायन आगे चल कर वेदों का भाष्य करने के कारण वेदव्यास के नाम से विख्यात हुए.

कुंती को मिले वरदान के कारण पांडवों का जन्म

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स्वामी जी ने कहा कि, धर्म तत्वों का स्मरण व अनुसंधान द्वारा यदुवंशी राजा शूरसेन की पुत्री, वसुदेव और सुतसुभा की बड़ी बहन और भगवान् श्रीकृष्ण की बुआ कुंती को मिले एक वरदान के कारण पांडवों का जन्म हुआ. एक बार ऋषि दुर्वासा, कुंती की सेवा से बहुत प्रसन्न हुए और कुंती को एक मंत्र देते हुए कहा कि इस मंत्र के जाप द्वारा तुम जिस भी देवता का आवाहन करोगी, तुम्हें उसी देव पुत्र की प्राप्ति होगी. बाद में कुंती ने इस वरदान का इस्तेमाल कर पुत्रों की प्राप्ति की, क्योंकि पांडु को यह शाप मिला था कि जब तुम पत्नी को छुओगे, तो तत्काल तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी. दुर्वासा ऋषि से मिले वरदान की सहायता से कुंती ने सर्वप्रथम यम यानी धर्म के देवता का आह्वान किया. जिससे उन्हें युधिष्ठिर की प्राप्ति हुई. इसी प्रकार भीमसेन पवन देव के अंश थे. कुंती को अर्जुन की प्राप्ति देवराज इंद्र से हुई थी. संतान प्राप्ति का मंत्र कुंती ने पांडु की दूसरी पत्नी माद्री को भी दिया. जिसकी सहायता से उसने दो अश्विनी कुमारों नासत्य और दस्त्र का आवाहन किया. जिससे उसे नकुल और सहदेव पुत्र के रूप में प्राप्त हुए. इस प्रकार पांचों पांडवों का जन्म हुआ. आगे चलकर माद्री पांडु की मृत्यु के बाद सती हो गयी. कुंती ने पांचों पांडवों का लालन-पालन किया.

अहंकारी व्यक्ति हमेशा अहंकार उगलता रहता है

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स्वामी जी महाराज ने कहा कि महाभारत अहंकार के कारण ही हुआ था. द्रौपदी ने ही इंद्रप्रस्थ में युधिष्ठिर के राज्याभिषेक के समय दुर्योधन को कहा था, अंधा का लड़का अंधा ही होता है. इन्हीं शब्दों का कारण महाभारत का संग्राम हुआ.

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