हड़िया बेचकर चलाती थीं घर, अब सब्जी खेती से बनीं आत्मनिर्भर
अपने पति के साथ खेत की फसल को दिखाती अर्चना पहाड़िन | Prabhat Khabar Network
झारखंड की अर्चना पहाड़िन ने फूलो-झानो आशीर्वाद अभियान की मदद से हड़िया बेचने का काम छोड़ सब्जी की खेती शुरू की और आज आत्मनिर्भर बनकर सम्मान से जी रही हैं।
पाकुड़ के महेशपुर प्रखंड के बिरकिट्टी गांव की अर्चना पहाड़िन की कहानी संघर्ष, मेहनत और आत्मनिर्भरता की प्रेरक मिसाल है. कभी आजीविका के सीमित साधनों के कारण उन्हें हड़िया बनाकर और बेचकर परिवार का भरण-पोषण करना पड़ता था. परिवार के पास खेती योग्य जमीन भी नहीं थी, जिससे सम्मानजनक आजीविका की राह कठिन बनी हुई थी. मार्च 2025 में झारखंड सरकार की महत्वाकांक्षी फूलो-झानो आशीर्वाद अभियान ने उनके जीवन में बदलाव की नई शुरुआत की. जेएसएलपीएस के माध्यम से उन्हें 25 हजार रुपये की ब्याजमुक्त वित्तीय सहायता मिली. योजना का लाभ दिलाने में नव जीवन सखी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने अर्चना को योजना की जानकारी देने, आवेदन प्रक्रिया पूरी कराने और राशि के सदुपयोग के लिए मार्गदर्शन किया.
लीज पर जमीन लेकर शुरू की खेती
प्राप्त राशि से अर्चना ने तीन बकरियां खरीदीं तथा शेष राशि का निवेश सब्जी खेती में किया. जमीन नहीं होने के बावजूद उन्होंने गांव में लीज पर भूमि लेकर खेती करने का निर्णय लिया. द-नुदगी इंस्टीट्यूट के तकनीकी सहयोग से अप्रैल माह में 20 डिसमिल जमीन पर कद्दू, करेला और झींगा की खेती शुरू की.
पति ने भी निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
खेती के लिए आवश्यक सामग्री की व्यवस्था से लेकर तैयार सब्जियों की बिक्री तक में उनके पति ने पूरा सहयोग किया. मेहनत का परिणाम यह रहा कि अर्चना इस सीजन में अब तक साढ़े आठ क्विंटल से अधिक सब्जियों की बिक्री कर चुकी हैं. इससे उन्हें 30 हजार रुपये से अधिक की आय प्राप्त हुई है.
सरकारी योजनाओं का भी मिल रहा लाभ
अर्चना पहाड़िन ने बताया कि फूलो-झानो आशीर्वाद अभियान उनके लिए नई जिंदगी देने वाली योजना साबित हुई है. आज वह सम्मानजनक आजीविका से जुड़कर परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं. उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, उज्ज्वला योजना और बीमा योजना सहित विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिल रहा है. अर्चना की सफलता यह साबित करती है कि सही मार्गदर्शन, वित्तीय सहयोग और तकनीकी सहायता मिलने पर सीमित संसाधनों के बावजूद भी आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन की नई पहचान बनाई जा सकती है.
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