हाथियों से बचने के लिए पेड़ों पर बनाते हैं मचान, कोल्हान के गांवों में आज भी जिंदा है ये अनोखा तरीका

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खेत के बीच में बना मचान

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जमशेदपुर के कोल्हान क्षेत्र में हाथियों से बचने के लिए ग्रामीण आज भी पेड़ों पर 'भाड़ी' (मचान) बनाकर अपनी सुरक्षा करते हैं. यह सदियों पुरानी आदिवासी बुद्धिमत्ता आज भी जीवनशैली का हिस्सा है.

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जमशेदपुर: सोशल मीडिया और तकनीक के प्रसार से आज कोल्हान क्षेत्र में हाथियों की गतिविधियों और उनसे जुड़ी घटनाओं की जानकारी तुरंत मिल जाती है. ऐसा नहीं है कि अतीत में हाथियों के हमले या घुसपैठ की घटनाएं कम होती थीं; पहले भी घटनाएं व्यापक पैमाने पर होती थीं, लेकिन संचार साधनों के अभाव में खबरें बाहर नहीं आ पाती थीं.

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आज इंटरनेट के जरिए सूचनाएं पल भर में फैल जाती हैं, जिससे लोगों को सतर्क रहने और त्वरित राहत कार्य पहुंचाने में मदद मिलती है. हालांकि, तकनीक के इस आधुनिक दौर के बावजूद, जंगलों के आसपास रहने वाले ग्रामीणों को अपनी सुरक्षा के लिए अब भी अपने पारंपरिक और जमीनी उपायों पर ही निर्भर रहना पड़ता है.

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कोल्हान के आदिवासी बहुल गांवों में आज भी पेड़ों के ऊपर बनी हुई झोपड़ीनुमा संरचनाएं आसानी से दिख जाती हैं. जिसे हम मचान कहते हैं. लेकिन स्थानीय भाषा में इसे 'भाड़ी' कहा जाता है. अक्सर पहली नजर में यह किसी के विश्राम करने या मस्ती के लिए बनाई गई जगह लग सकती है, लेकिन असलियत इससे बिल्कुल जुदा है.

यह मचान कोई पर्यटन या आरामगाह नहीं, बल्कि गांव वालों के लिए एक सुरक्षा दुर्ग की तरह काम करती है. यह सदियों से चली आ रही आदिवासी बुद्धिमत्ता का एक अनुपम उदाहरण है, जो उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी सुरक्षित रहने का हौसला देता है.

पूरी रात यहां से नजर रखते हैं हाथियों की हर हरकत पर

जंगलों से सटे गांवों में रहने वाले आदिवासियों के लिए मचान उनकी फसलों और घरों की रक्षा का प्रमुख साधन है. सूर्यास्त होते ही गांव के युवक इन मचानों पर चढ़ जाते हैं और पूरी रात वहीं रहकर हाथियों की हर हरकत पर नजर रखते हैं.

जैसे ही रात के अंधेरे में हाथियों का कोई झुंड खेतों या आबादी की तरफ बढ़ता है, मचान पर तैनात युवक तुरंत मशाल जलाकर तेज आवाजें निकालते हैं. आग और रोशनी को देखकर हाथी खेतों में तबाही मचाए बिना वापस जंगल की ओर लौट जाते हैं.

पारंपरिक विरासत का अस्तित्व आज भी बरकरार

आधुनिकता और नई तकनीकों के आने से कोल्हान के गांवों में मचानों की संख्या में भले ही पहले की तुलना में कुछ कमी आयी हो, लेकिन यह परंपरा पूरी तरह से विलुप्त नहीं हुई है. आज भी हाथी प्रभावित इलाकों में ग्रामीण इस स्वदेशी तकनीक को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाए हुए हैं.

सोशल मीडिया भले ही अलर्ट देने का काम करे, लेकिन खेतों में खड़ी फसल और जान-माल की रक्षा के लिए रात के सन्नाटे में जलती हुई मशाल और यह मचान ही आदिवासियों का सबसे भरोसेमंद सहारा बना हुआ है.

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