Hazaribagh News: करमा पूजा से पहले होती है भूत भरनी, जानें बड़कागांव की अनोखी परंपरा

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बड़कागांव में भूत भरनी से करमा पर्व की शुरुआत

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बड़कागांव में करमा पूजा की शुरुआत अनोखी भूत भरनी रस्म से होती है. इस पर्व में 'आपन करम भैया के धरम' की विशेष परंपरा है, जहां भाई-बहन सुख-समृद्धि की कामना करते हैं. जानें इससे जुड़ी लोककथाएं.

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संजय सागर की रिपोर्ट

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बड़कागांव (हजारीबाग): जिले के बड़कागांव प्रखंड में करमा पर्व अनोखी परंपराओं के साथ मनाया जाता है. यहां करमा पूजा की शुरुआत भूत भरनी की रस्म के बाद होती है. 21 सितंबर को नहाय-खाय के साथ करमा पूजा शुरू हो गई. 22 सितंबर को व्रत रखा जायेगा. रात आठ बजे से 10 बजे तक करम की डाल के नीचे पूजा होगी, जबकि रातभर झूमर गीत और नृत्य का दौर चलेगा. 23 सितंबर को करम की डाल को नदी और तालाब में विसर्जित किया जायेगा. इसके बाद दिनभर झूमर गीत और नृत्य होंगे.

तीज का डाला विसर्जन से पहले होती है भूत भरनी

बड़कागांव में करमा पूजा की सबसे खास परंपरा भूत भरनी है. यहां तीज का डाला विसर्जित करने से पहले गवाट और भक्ताइन द्वारा भूत भरनी की जाती है. इसके बाद करम की डाल स्थापित की जाती है. सात दिनों तक करम की डाल को सुबह-शाम जगाया जाता है.

करमा पूजा से एक दिन पहले संजोत के दिन गांव के पाहन घनश्याम भुइयां रात करीब दो बजे देवी मंडप से भूत भरते हुए महोदी पहाड़ की गुफा में जाते हैं. वहां से कदम के फूल लाकर देवी मंडप और गांव के विभिन्न मंदिरों में चढ़ाये जाते हैं. इसके बाद इन फूलों को करमा के सभी अखाड़ों तक पहुंचाया जाता है. बड़कागांव के कई गांवों और मोहल्लों में देवास लगाने वाले भक्त भी भूत भरनी की रस्म निभाते हैं. इसके बाद करमा पूजा शुरू होती है.

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गांव में सुख-समृद्धि की मान्यता

पाहन देवल भैया के अनुसार, भूत भरने के पीछे मान्यता है कि गांव के देवता ग्वांट और कुल देवता अखाड़े में आते हैं. इसके बाद सभी को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देकर चले जाते हैं. इसी मान्यता के साथ बड़कागांव में भूत भरनी की परंपरा निभायी जाती है.

'आपन करम भैया के धरम' की परंपरा

करमा पूजा में कुंवारी और विवाहित बहनों के साथ भाई भी अखाड़ों में करम की डाल के नीचे पूजा करते हैं. पूजा में खीरा और अंकुरित चना का विशेष महत्व है. इस दौरान भाई-बहन एक-दूसरे से पूछते हैं, 'ककर करम?' इसके जवाब में बहनें कहती हैं, 'आपन करम, भैया के धरम.' इसके बाद एक-दूसरे को खीरे से पीठ पर मारने की परंपरा है. इसके बाद महिलाएं और युवतियां फलाहार करती हैं. अगले दिन सुबह करम की डाल को पोखर या नदी में विसर्जित किया जाता है. करमा पर्व की एक खासियत यह भी है कि शादीशुदा महिलाएं पर्व मनाने के लिए मायके आती हैं. इससे पर्व के दौरान मायके में उत्सव का माहौल बनता है.

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करम-धरम की कथा से जुड़ा है पर्व

करमा पर्व को लेकर कई लोककथाएं प्रचलित हैं. एक मान्यता के अनुसार, यह पर्व करम और धरम नामक दो भाइयों की कथा से जुड़ा है. कहा जाता है कि दोनों भाई गरीब थे और उनकी बहन बचपन से ही भगवान से उनके सुख-समृद्धि की कामना करती थी. बहन के तप और पूजा के कारण दोनों भाइयों के घर में सुख-समृद्धि आयी. बाद में दोनों भाइयों ने अपनी बहन की रक्षा के लिए दुश्मनों से संघर्ष किया और अपनी जान गंवा दी. इसी कथा से करमा पर्व की परंपरा जुड़ी मानी जाती है.

करम पूजा से जुड़ी एक और लोककथा

करम-धरम से जुड़ी एक अन्य लोककथा भी प्रचलित है. इसके अनुसार, करम भगवान करमा की पूजा करता है. उसकी पत्नी गर्म दूध से करम के पौधे को स्नान करा देती है, जिससे उसका कर्म और भाग्य जल जाता है और वह गरीब हो जाता है. वहीं उसका भाई धरम विधि-विधान से पूजा करता है, इसलिए वह समृद्ध हो जाता है. इसके बाद करम दोबारा करम की डाल की पूजा और सेवा करता है. मान्यता है कि इससे उसका करम जाग जाता है. रास्ते में उसे कई स्थानों पर सोना, चांदी और पैसे मिलते हैं और वह फिर से समृद्ध हो जाता है. इसी तरह करमा पर्व में करम-धरम से जुड़ी कई लोककथाओं और मान्यताओं का उल्लेख मिलता है.

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