ePaper

उरांव जनजाति में फगुवा पर्व का विशेष महत्व है

Updated at : 12 Mar 2025 5:27 PM (IST)
विज्ञापन
उरांव जनजाति में फगुवा पर्व का विशेष महत्व है

उरांव जनजाति समाज में प्रत्येक पर्व त्योहार को मनाने के पीछे कोई ना कोई ऐतिहासिक घटना जुड़ी हुई है.

विज्ञापन

12 गुम 21 में उरांव जनजाति के युवक व लोग प्रतिनिधि, गुमला उरांव जनजाति समाज में प्रत्येक पर्व त्योहार को मनाने के पीछे कोई ना कोई ऐतिहासिक घटना जुड़ी हुई है. इस समाज में फग्गु (फगुवा) परब मनाने की परंपरा अन्य जाति एवं धर्म के लोगों से अलग ही दिखायी देती है. उरांव लोगों के साथ-साथ मुंडा एवं खड़िया जाति में भी लगभग समान रूप से परब मनाने की परंपरा है. परंतु उरांव जाति जिस प्राचीन कारण से फगुआ त्योहार मनाते हैं. इसका एक ऐतिहासिक महत्व अलग ही है. फगुवा मानने के पीछे जो दंत कथा या लोक कथा पुरखों द्वारा कही गयी है या गीतों में मिलती है. उसके अनुसार जब पृथ्वी का सृजन हुआ तो महादेव ने पृथ्वी पर पेड़, पौधे, हवा, लाखों जीव जंतुओं का भी सृजन किया और महादेव ने मनुष्य जीव को भी सृजित किया. पुराने समय में फगुवा होली पर ख़ुशी और उमंग में धूल उड़ाया करते थे. रंग और अबीर खेलने की परंपरा बहुत बाद में आयी. फूलों के रसों से अनेक रंगों के रंग बनाकर होली खेला जाता था. सेमल वृक्ष को काटना सोनो रुपो गिद्ध का वध करना पाप का नाश करना समझ गया. क्योंकि सेम्बल वृक्ष और गिद्ध के मरने पर मानव समुदाय में नई खुशी और नई उमंग आयी. लोग भय मुक्त होकर जीवन यापन करने लगे इसी कारण उरांव जाति में आज भी फग्गु काटने फगुआ काटने के पूर्व एक सप्ताह तक शिकार खेलने की परंपरा चली आ रही है. शिकार खेलने का अर्थ सोनो और रूपो गिद्धनी का वध करना है. जंगल से सेमल की तीन डालियां को लाकर गांव के निश्चित स्थान में गाड़ा जाता है. देवेंद्र लाल उरांव बताते हैं ने बताया कि हमारे गांव में भी फग्गु पर्व के एक दिन पूर्व सभी गांव के लोग एक लंबी घास जिसे खैर घास कहा जाता है. उसे लेकर आते हैं और गांव का ही कोई व्यक्ति तीन डाली वाला सेमल का पेड़ लेकर आता है और शाम के समय पुजार द्वारा उचित स्थान में उस सिंबल की डाल को गड़ा जाता है और उसे खैर घास से पूरी तरह ढक दिया जाता है. गांव के सभी लोगों के आने जुटने पर उसे जलाया जाता है और वहीं पर पुजारी द्वारा गांव की खुशहाली की कामना की जाती है. लोग उस जले हुए राख को छूते हैं. ताकि उनका शारीरिक दर्द, घाव, फोड़ा, फुंसी उनके शरीर में ना रहे. अगले दिन यानी की फगुवा पर्व के दिन गांव के सभी छोटे बड़े बुजुर्ग लोग शिकार के लिए जंगल जाते हैं और जंगल में जो भी जंगली जीव मिलता है. उसका शिकार करते हैं और आपस में बाटते हैं. जंगल में ही पूजा की सामग्री महुआ का खोन्च धाउ फूल लेकर आते हैं और घर में घर बुजुर्ग धूप धुवन हड़िया अरवा चावल मुर्गा को चरा कर मनौती देकर पूजा करते हैं. अपने पुरखों को याद करते हैं. घर परिवार समाज की सुख समृद्धि कि मनोकामना करते हैं. फिर धूम धाम से रंग लगाते हैं. फगुवा मानते हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

विज्ञापन
VIKASH NATH

लेखक के बारे में

By VIKASH NATH

VIKASH NATH is a contributor at Prabhat Khabar.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola