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कैदी को रिहा कराने के लिए दो अफसरों ने दी थी गलत रिपोर्ट, कार्रवाई का आदेश मिला तो जेल मुख्यालय चला गया कोर्ट

By Prabhat Khabar Print Desk
Updated Date
कैदी को रिहा करने को लेकर गलत रिपोर्ट देने का मामला, कैदी के बचाव के पक्ष में गिरिडीह जेल प्रशासन पहुंचा कोर्ट
कैदी को रिहा करने को लेकर गलत रिपोर्ट देने का मामला, कैदी के बचाव के पक्ष में गिरिडीह जेल प्रशासन पहुंचा कोर्ट
सांकेतिक तस्वीर

giridih news, giridih jail, Giridih Badri Narayan Prasad murder case गिरिडीह : हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी पवन तिवारी को रिहा कराने को लेकर गिरिडीह व मेदिनीनगर जेल के दो अफसरों ने राज्य सजा पुनरीक्षण पर्षद को गलत रिपोर्ट दी थी. रिपोर्ट के आधार पर 10 जून 2017 को पवन की रिहाई हो गयी थी. इस मामले में लोकायुक्त जस्टिस डीएन उपाध्याय ने गिरिडीह जेल के तत्कालीन प्रोवेशन पदाधिकारी कमलजीत सिंह और पलामू जिले के केंद्रीय कारा, मेदिनीनगर के तत्कालीन अधीक्षक प्रवीण कुमार पर लगे आरोप को प्रथमदृष्टया सही पाते हुए कार्रवाई के लिए गृह विभाग के प्रधान सचिव से अनुशंसा की थी.

वहीं, एक माह में कार्रवाई की रिपोर्ट देने को कहा था. इधर, इस मामले में जेल आइजी ने गृह विभाग को पत्र देकर सूचित किया कि लोकायुक्त के उक्त आदेश को निरस्त करने के लिए महाधिवक्ता के माध्यम से हाइकोर्ट में अपील दायर की गयी है. यानी मामले में जिन अफसरों पर लोकायुक्त ने कार्रवाई का आदेश दिया, उन्हें बचाने के लिए जेल मुख्यालय कोर्ट चला गया. राज्य में संभवत: इस तरह का यह पहला मामला है.

यह है मामला :

सात जुलाई 2000 को गिरिडीह में बद्री नारायण प्रसाद की गोली मारकर हत्या व इनके एक बेटे अमर शंकर कुमार उर्फ रिंकू को गोली मारकर घायल कर दिया गया था. इस मामले में 24 फरवरी 2003 को जिला एवं सत्र न्यायाधीश की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने बरमसिया, गिरिडीह निवासी पवन तिवारी, उसका भाई अरुण तिवारी व दोनों के पिता नारायण तिवारी को आजीवन कारावास की सजा सुनायी थी.

हाइकोर्ट ने भी 26 फरवरी 2015 को तीनों की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा. सर्वोच्चय न्यायालय ने भी पवन तिवारी के आवेदन को खारिज कर दिया था. जिस वक्त पवन तिवारी को सजा सुनायी गयी थी, उस वक्त वह गिरिडीह जेल में था. बाद में उसे हजारीबाग केंद्रीय कारा ट्रांसफर कर दिया गया.

लेकिन, वहां रहते इसके पास से पुलिस ने मोबाइल फोन बरामद किया और इसकी प्रवृत्ति आपराधिक पायी गयी. इसके बाद पवन को हजारीबाग जेल से केंद्रीय कारा मेदिनीनगर ट्रांसफर कर दिया गया. उधर, मामले में गिरिडीह के तत्कालीन एसपी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पवन के कारा से मुक्ति मिलने पर फिर से अपराध की प्रबल संभावना है.

इतना ही नहीं जेल जाने के बाद वहां से बाहर निकलने के लिए पवन तिवारी ने जीवित पत्नी को मृत बता कोर्ट में झूठा मृत्यु प्रमाण पत्र देकर हाइकोर्ट से छह अप्रैल 2005 से दो मई 2005 तक के लिए प्रोविजनल बेल ले ली थी. इसके बाद उसे कोर्ट में सरेंडर करना था, पर वह फरार हो गया था. तब उसे कोर्ट के निर्देश पर पटना से पुलिस ने गिरफ्तार किया था.

गिरिडीह के प्राेवेशन पदाधिकारी कमलजीत सिंह मामले की जांच करने पटना पहुंच गये थे. लेकिन गिरिडीह जहां घटना हुई थी, वहां जांच नहीं की. जबकि, कमलजीत व पवन का घर आसपास था. मृतक की पत्नी उर्मिला देवी ने भी मामले में आवेदन दिया था, लेकिन इनके आवेदन पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी. इससे साफ है कि गिरिडीह जेल के पदाधिकारी ने सही तरीके से मामले में कार्रवाई नहीं कर रिपोर्ट मेदिनीनगर केंद्रीय कारा के अधीक्षक को सौंप दी.

लोकायुक्त का आदेश

लोकायुक्त ने आदेश में कहा था कि दोनों पदाधिकारियों ने अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन निष्ठापूर्वक नहीं किया. वहीं, हत्या जैसे जघन्य अपराध में सजा प्राप्त बंदी पवन तिवारी की समय पूर्व कारा से मुक्ति की अनुशंसा की गयी.

इसलिए मामले में गिरिडीह जेल के तत्कालीन प्रोवेशन पदाधिकारी कमलजीत सिंह व पलामू जिले के केंद्रीय कारा, मेदिनीनगर के तत्कालीन अधीक्षक प्रवीण कुमार पर लगे आरोप को प्रथमदृष्टया सही पाते हुए कार्रवाई के लिए गृह विभाग से अनुशंसा की जाती है. कार्रवाई प्रतिवेदन एक माह में देने को कहा गया था.

Posted By : Sameer Oraon

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