कुदरत का कहर या प्रशासनिक लापरवाही? चंदे से बनी पुलिया बही, टापू में तब्दील हुए गिरिडीह के कई गांव

टूटा हुआ पुल का दृश्य, वहां पर मौजूद ग्रामीण
गिरिडीह जिले में बारिश ने विकास के दावों की पोल खोल दी. ग्रामीणों के चंदे से बना अस्थायी पुल बह गया, जिससे आधा दर्जन से अधिक गांवों का संपर्क मुख्यालय से कट गया है. प्रशासन की अनदेखी और स्थानीय लोगों की मेहनत का दर्द बयां करती यह खबर.
गांडेय से शमशुल अंसारी की रिपोर्ट
Giridih Bridge Incident, गिरिडीह : झारखंड के गिरिडीह जिले स्थित गांडेय प्रखंड से विकास के दावों की हवा निकालने वाली एक बड़ी खबर सामने आई है. रविवार रात हुई हल्की बारिश ने ही बुद्धूडीह और जोरासिमर के बीच नदी पर बनी अस्थायी पुलिया को बहा दिया. इस पुलिया के बह जाने से आधा दर्जन गांवों का संपर्क प्रखंड मुख्यालय से पूरी तरह कट गया है और ग्रामीणों की आवाजाही ठप हो गई है.
सरकार नहीं, ग्रामीणों ने चंदा कर बनाई थी 'लाइफलाइन'
हैरानी की बात यह है कि जिस पुलिया को बारिश ने बहाया, उसे सरकार ने नहीं, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों ने चंदा इकट्ठा कर और श्रमदान के जरिए बनाया था. ग्रामीण जामुन मंडल, संजय मंडल, मोहन मंडल और दसिया देवी सहित अन्य लोगों ने बताया कि प्रशासन से कोई मदद न मिलने पर उन्होंने खुद ही पाइप, मिट्टी और मोरम (मिट्टी-पत्थर का मिश्रण) डालकर आवाजाही के लिए यह रास्ता दुरुस्त किया था. हल्की बारिश ने ग्रामीणों की महीनों की मेहनत और उनकी एकमात्र 'लाइफलाइन' को चंद मिनटों में तबाह कर दिया.
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इन गांवों पर टूटा आफत का पहाड़, ठप हुई जिंदगी
पुलिया बहने से सबसे ज्यादा प्रभावित पुतरिया, पहरमा, तेतरिया और बल्कूडीह के ग्रामीण हुए हैं. वे पूरी तरह से टापू में तब्दील हो गए हैं. ग्रामीणों ने बताया कि अब उन्हें बुद्धूडीह पंचायत सचिवालय, स्वास्थ्य उप केंद्र, आदर्श उच्च विद्यालय और स्थानीय बाजार जाने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. बीमारों को अस्पताल ले जाना या बच्चों का स्कूल जाना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है.
'चुनाव से सुन रहे हैं पुल की बात, पर धरातल पर सब शून्य'
प्रशासनिक उपेक्षा से नाराज ग्रामीणों ने बताया कि वे पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव से नेता बोलते आ रहे हैं कि इस नदी पर पक्के पुल के निर्माण की स्वीकृति हो चुकी है. टेंडर जारी होने और जल्द काम शुरू होने के बड़े-बड़े दावे किए गए. लेकिन, चुनाव बीतते ही वादे हवा हो गए. हकीकत यह है कि आज तक धरातल पर पुल निर्माण का एक पत्थर भी नहीं रखा गया है, जिसका खामियाजा हजारों ग्रामीणों को भुगतना पड़ रहा है.
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लेखक के बारे में
By समीर उरांव
इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.
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