उत्तम आर्जव धर्म पर मुनि प्रमाण सागर ने दिया संदेश, कहा- दिखावे से नहीं, सच्चाई से जीवन बनता है
कार्यक्रम में शामिल श्रद्धालु
राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज ने समझाया कि जीवन में सच्ची सरलता और सहजता तब आती है, जब हम स्वयं के प्रति ईमानदार हों. उन्होंने उत्तम आर्जव धर्म के सार को बताते हुए कहा कि जैसा मन में हो, वैसा ही बाहर व्यवहार होना चाहिए. यह सिद्धांत रिश्तों और व्यापार में भी लागू होता है.
पीरटांड़. दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन शुक्रवार को उत्तम आर्जव धर्म की आराधना की गयी. गुणायतन में आयोजित धर्मसभा में राष्ट्रसंत मुनि प्रमाण सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को जीवन में सरलता, सहजता और आत्मस्वीकृति का महत्व बताया.

उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में सरलता और सहजता तभी आती है, जब वह सबसे पहले स्वयं के प्रति सच्चा बने और अपनी वास्तविक स्थिति को स्वीकार करे. मनुष्य जैसा भीतर है, वैसा ही बाहर भी हो, यही उत्तम आर्जव धर्म का सार है.
स्वयं से पूछें चार सवाल
मुनि श्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को समय-समय पर स्वयं से चार सवाल करने चाहिए. वह अपने भीतर क्या देखता है, स्वयं को कैसा समझता है, दूसरों के सामने कैसा दिखना चाहता है और वास्तव में जैसा दिखाता है, क्या वह वैसा ही है. उन्होंने कहा कि व्यक्ति अक्सर अपनी अच्छाइयों को देखता है और कमियों को नजरअंदाज करता है.
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मुनि श्री ने कहा कि गलती होने के बाद स्वयं को सही साबित करने के लिए तर्क देना ही कपट है. गलती स्वीकार करने से सुधार का रास्ता खुलता है, जबकि गलती को स्वीकार नहीं करने से सुधार के द्वार बंद हो जाते हैं. धर्म केवल परिवर्तन की इच्छा करने का नाम नहीं, बल्कि जीवन में परिवर्तन लाने का साहस है.

आचरण में दिखना चाहिए धर्म
दुर्योधनी वृत्ति की व्याख्या करते हुए मुनि श्री ने कहा कि धर्म को जानना, लेकिन उसके अनुसार आचरण नहीं करना तथा अधर्म को जानते हुए भी उससे दूर नहीं होना इसी वृत्ति का परिचायक है. उन्होंने कहा कि व्यक्ति घर, व्यापार, समाज, मंदिर और गुरुजनों के सामने अलग-अलग चेहरा रखता है. यह बहुरूपता मन में तनाव पैदा करती है. जहां कुछ छिपाना पड़ता है, वहां सहजता समाप्त हो जाती है.
संवाद से रिश्तों में आता है माधुर्य
मुनि श्री ने पारिवारिक जीवन में भी आर्जव धर्म के महत्व को समझाया. उन्होंने कहा कि पति-पत्नी के बीच विश्वास, बच्चों से खुला संवाद और भाई-भाई के बीच मन की शिकायतों को दूर करना जरूरी है. संवाद से मन की गांठें खुलती हैं और रिश्तों में माधुर्य आता है.
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उन्होंने कहा कि व्यापार में आर्जव का अर्थ भोला बन जाना नहीं है. हिसाब-किताब, दक्षता और सावधानी के साथ नैतिकता एवं प्रामाणिकता बनाए रखना जरूरी है. धोखा, मिलावट, ठगी और विश्वासघात से बचना चाहिए. अच्छी नीयत रखने वाले व्यक्ति का संकट के समय भी लोग साथ देते हैं, जबकि खराब नीयत वाला व्यक्ति अपना विश्वास खो देता है.
दिखावे से बचने की जरूरत
मुनि श्री ने कहा कि समाज और धर्मक्षेत्र में भी दिखावे से बचने की जरूरत है. सामने प्रशंसा और पीछे निंदा करना कपट है. पूजा आत्मशुद्धि के लिए, गुरुसेवा श्रद्धा से, उपवास आत्मसंयम के लिए और दान परोपकार के लिए होना चाहिए, प्रतिष्ठा के लिए नहीं.
उन्होंने कहा कि उत्तम आर्जव धर्म व्यक्ति को भीतर और बाहर से एक जैसा बनने की प्रेरणा देता है. जीवन में सच्चाई, सरलता और प्रामाणिकता को अपनाकर ही इस धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझा जा सकता है.
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