25 साल बाहर भटके, दुबई तक गये, फिर गांव में ही खोजी रोजगार की राह
पलायन की राह से लौटकर कामेश्वर ने गांव में खोजी रोजगार की राह | Prabhat Khabar Network
दुबई और अन्य शहरों में 25 साल भटकने के बाद कामेश्वर ने अपने गांव में दुकान खोलकर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। जानें उनकी प्रेरणादायक कहानी।
धुरकी के खुटिया निवासी कामेश्वर गौंड की कहानी बनी उम्मीद, लॉकडाउन के बाद सड़क किनारे छोटी दुकान से शुरू किया रोजगार
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धुरकी, गढ़वा : गढ़वा जैसे पिछड़े और रोजगार के सीमित अवसर वाले जिले में पलायन हजारों परिवारों की मजबूरी है. रोजी-रोटी की तलाश में लोग दूसरे राज्यों से लेकर विदेशों तक जाते हैं. ऐसे माहौल में धुरकी प्रखंड के खुटिया गांव निवासी कामेश्वर गौंड की कहानी उम्मीद जगाती है. करीब 25 साल तक बाहर काम करने और दुबई तक जाने के बाद जब कोरोना काल में रोजगार छूटा, तो उन्होंने गांव लौटकर यहीं रोजगार तलाशने का फैसला किया. आज सड़क किनारे उनकी छोटी सी दुकान परिवार की रोजी-रोटी का सहारा बनी हुई है.
25 साल बाहर गुजारे, फिर गांव में शुरू की नयी राह
कामेश्वर बताते हैं कि उन्होंने जिंदगी के करीब 25 साल घर से बाहर मजदूरी करते हुए गुजार दिये. कभी दूसरे राज्यों में तो कभी दुबई जाकर काम किया. छह सदस्यों के परिवार में कमाने वाले वह अकेले थे. कमाई इतनी नहीं थी कि परिवार की आर्थिक स्थिति में अपेक्षित बदलाव आ सके.
मुंबई में लॉकडाउन लगा तो काम बंद हो गया. मुश्किल हालात में वह गांव लौटे. घर लौटने के बाद परिवार के भरण-पोषण की चिंता सामने थी. बाहर जाने का रास्ता बंद था और हाथ में पूंजी भी नहीं थी. इसके बावजूद उन्होंने महाजन से कर्ज लेकर सड़क किनारे चौकी पर छोटी सी दुकान शुरू की.
छोटी दुकान बनी परिवार का सहारा
शुरुआत छोटी थी, लेकिन मेहनत रंग लायी. दुकान चलने लगी तो कामेश्वर ने अधबने मकान में अल्बेस्टर लगाकर उसे व्यवस्थित किया. धीरे-धीरे दुकान परिवार की आय का स्थायी साधन बन गयी. इसी आमदनी से बच्चों की पढ़ाई और परिवार का खर्च चलने लगा.
अब बच्चे भी जरूरत पड़ने पर दुकान के काम में पिता का हाथ बंटाते हैं. कामेश्वर के लिए यह दुकान सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि वर्षों बाद परिवार के साथ रहने का जरिया भी बनी.
दूसरे युवाओं को भी मिली प्रेरणा
कामेश्वर बताते हैं कि उनके साथ बाहर काम करने जाने वाले कई युवक अब गांव में ही छोटे-छोटे रोजगार कर रहे हैं. कोई मुर्गी फार्म चला रहा है, तो किसी ने पान की दुकान शुरू की है. करीब सात-आठ युवक ऐसे हैं, जो पहले रोजगार के लिए बाहर जाते थे, लेकिन अब गांव में ही काम तलाश रहे हैं.
कामेश्वर की राह आसान नहीं रही. माता-पिता की असमय मौत और बड़े भाई के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी और बढ़ गयी. इसके बावजूद उन्होंने मेहनत का रास्ता नहीं छोड़ा और धीरे-धीरे परिवार को संभाल लिया.
आज कामेश्वर अपने परिवार के साथ गांव में हैं. उनकी कहानी बताती है कि रोजगार का रास्ता हमेशा शहरों से होकर नहीं गुजरता. छोटी शुरुआत, मेहनत और हौसले के दम पर गांव में भी रोजी-रोटी का रास्ता तैयार किया जा सकता है.
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