पेटरवार बाजार में करम परब की रौनक, बांस की जावा डाली-करम डाली खरीदने उमड़ी भीड़

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खरीदारी करती महिलाएं

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बोकारो के पेटरवार बाजार में बांस से बने उत्पादों की भारी मांग है. करम परब के अवसर पर यहां जावा डाली और पूजा सामग्री खरीदने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ रही है.

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पेटरवार. करम परब नजदीक आते ही बोकारो जिले के पेटरवार बाजार में बांस से बनी पारंपरिक सामग्रियों की मांग बढ़ गयी है. यहां प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को लगने वाले साप्ताहिक बाजार में सुबह से देर शाम तक बांस से बनी उपयोगी वस्तुओं की खरीद-बिक्री होती है. करम परब को लेकर शनिवार को बाजार में जावा डाली, करम डाली, टोकी, सूप, खैरका और अन्य पूजा सामग्रियों की खरीदारी के लिए लोगों की भीड़ उमड़ी.

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खासकर युवतियां और महिलाएं करम परब की तैयारी के लिए जरूरी सामग्रियों की खरीदारी करती नजर आयीं. आदिवासी, मूलवासी, किसान समेत प्रकृति की पूजा करने वाले विभिन्न समुदायों के लिए बांस से बनी ये वस्तुएं परब की परंपरा और धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई हैं.

बांस से बनती हैं कई उपयोगी सामग्रियां

बांस एक बहुवर्षीय पौधा है, जिसका उत्पादन पेटरवार और आसपास के गांवों में बड़े पैमाने पर होता है. इससे बनी सामग्रियों की बिक्री पेटरवार बाजार में पूरे साल होती है. हालांकि पर्व-त्योहार, शादी-विवाह, पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठान, महायज्ञ और अन्य संस्कारों के अवसर पर इनकी मांग काफी बढ़ जाती है.

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शिल्पकार बांस से जावा डाली, करम डाली, टोकी, दुपा, सूप, सुपली, खांची, पथिया, मवनी, दवरा, अडोसी, हरका, पेटारी, खैरका, बिमनी, डेला, झाड़ू और विभिन्न प्रकार के खिलौने समेत कई तरह की सामग्री तैयार करते हैं. प्लास्टिक और कृत्रिम वस्तुओं का चलन बढ़ने के बावजूद ग्रामीण जीवन, कृषि कार्य, घरेलू उपयोग और पारंपरिक पूजा-पद्धति में बांस की वस्तुओं का महत्व आज भी कायम है.

कई गांवों के शिल्पकार पहुंचते हैं पेटरवार बाजार

पेटरवार, कसमार, जरीडीह, सिल्ली और गोला प्रखंड के रकुवा, बूटगोड़वा, सुतरी, बगदा, खैराचातर, त्रियोनाला, टोंडरा समेत दर्जनों गांवों के महिला और पुरुष शिल्पकार सप्ताह में दो दिन पेटरवार बाजार पहुंचते हैं. वे अपने हाथों से तैयार बांस की सामग्रियां बेचकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं.

सिल्ली प्रखंड के हलमाद गांव निवासी ममता देवी और छेदी कालिंदी बताते हैं कि वे पीढ़ियों से बांस की सामग्री बनाने और बेचने का काम करते आ रहे हैं. यह उनके समुदाय की पारंपरिक आजीविका है. आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होने के बावजूद इसी हुनर के सहारे परिवार का जीवन-यापन हो रहा है.

शिल्पकारों को सरकारी सहयोग की दरकार

शिल्पकारों का कहना है कि बांस से जुड़े पारंपरिक हुनर को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए सरकारी स्तर पर प्रशिक्षण, आर्थिक सहयोग और बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की जरूरत है. उनका कहना है कि आधुनिक डिजाइन, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता मिलने से वे बेहतर गुणवत्ता की सामग्री तैयार कर अपनी आय बढ़ा सकते हैं.

करम परब से बाजार में बढ़ी रौनक

करम परब नजदीक आते ही पेटरवार बाजार में बांस की सामग्रियों की बिक्री बढ़ गयी है. युवतियां और महिलाएं जावा डाली, करम डाली, टोकी, सूप, खैरका और झाड़ू समेत पूजा में उपयोग होने वाली अन्य वस्तुएं खरीद रही हैं. वहीं व्यापारी भी पेटरवार बाजार से बड़ी मात्रा में बांस की सामग्री खरीदकर आसपास के गांवों और शहरों के बाजारों में बिक्री के लिए ले जा रहे हैं.

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पेटरवार बाजार इस तरह बांस उत्पादों की खरीद-बिक्री का प्रमुख केंद्र बनने के साथ ग्रामीण शिल्पकारों की पारंपरिक कला और आजीविका को भी संबल दे रहा है.

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