चारे की खेती से पशुपालन तक, पेटरवार के किसानों ने खोजा कमाई का नया रास्ता; रोज रांची भेज रहे 2 हजार लीटर दूध

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खेत में लगी नेपियर घास

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बोकारो के जाराडीह में किसान नेपियर घास की खेती कर पशुपालन से लाखों कमा रहे हैं. जानिए कैसे यह गांव दुग्ध उत्पादन का बड़ा केंद्र बन गया है.

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पेटरवार प्रखंड की कोह पंचायत के जाराडीह (सरला खुर्द) गांव में हाइब्रिड नेपियर घास ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है. कभी सामान्य खेती पर निर्भर रहने वाले किसान अब हरे चारे की खेती को पशुपालन और दुग्ध उत्पादन से जोड़कर आमदनी बढ़ा रहे हैं. गांव में 50 प्रतिशत से अधिक घरों में पशुपालन हो रहा है और प्रतिदिन दो हजार लीटर से अधिक दूध रांची भेजा जा रहा है.

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2014-15 से बढ़ा रुझान

किसान कृष्ण कुमार महतो के अनुसार, वर्ष 2014-15 के आसपास गांव में सामान्य खेती के साथ नेपियर घास की खेती शुरू हुई. धीरे-धीरे किसानों का रुझान बढ़ता गया. वर्तमान में अकेले जाराडीह में करीब 20 एकड़ और पूरी कोह पंचायत में लगभग 50 एकड़ जमीन पर हाइब्रिड नेपियर उगाया जा रहा है.

एक बार लगाइए, वर्षों तक चारा पाइए

हाइब्रिड नेपियर बहुवर्षीय घास है. इसे एक बार लगाने के बाद करीब आठ से दस वर्षों तक हरा चारा मिलता है. लगभग 45 दिनों के अंतराल पर इसकी कटिंग की जाती है. ग्रामीणों के अनुसार, यह पशुओं के लिए स्वादिष्ट, सुपाच्य और पौष्टिक चारा है. इसकी उपलब्धता से पशुपालकों को बाजार से महंगा चारा खरीदने की जरूरत कम हो गयी है. इससे पशुपालन की लागत घटने के साथ मुनाफा बढ़ा है.

जाराडीह बना दुग्ध उत्पादन का केंद्र

गांव में पशुपालन का विस्तार नेपियर घास की उपलब्धता से जुड़ा है. पशुओं के आहार में करीब 90 प्रतिशत नेपियर घास और 10 प्रतिशत बिचाली की कुटी का इस्तेमाल किया जाता है. किसान घरों के परिसर में हवादार शेड बनाकर गायों का पालन करते हैं. पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था डिप बोरिंग से की जाती है.

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हैब्रिड नेपियर घास की कटिंग करते किसान

बीएमसी से आसान हुआ दूध का कारोबार

गांव में बल्क मिल्क कूलर यानी बीएमसी लगने से दूध कारोबार को बड़ी सुविधा मिली है. दूध को करीब चार डिग्री सेल्सियस तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है. गुणवत्ता की जांच लैक्टोस्कैन मशीन से होती है. इसके बाद टैंकर से दूध रांची के होटवार भेजा जाता है. आसपास के गांवों से भी दूध एकत्र किया जाता है.

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राज्य सरकार देती है प्रति लीटर पांच रु प्रोत्साहन राशि

पशुपालकों को दूध के भुगतान के अलावा झारखंड सरकार की ओर से प्रति लीटर पांच रुपये प्रोत्साहन राशि भी मिलती है. दूध का भुगतान प्रत्येक माह की 5, 15 और 25 तारीख को ऑनलाइन बैंक खातों में किया जाता है. स्थानीय स्तर पर पेटरवार की मिठाई दुकानों में भी दूध की आपूर्ति होती है.

गोबर से गैस और खेत के लिए खाद

जाराडीह में पशुपालन का लाभ केवल दूध तक सीमित नहीं है. किसान नेपियर घास की खेती में रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते. पशुओं के गोबर से गोबर गैस तैयार की जाती है, जिसका इस्तेमाल कई परिवार खाना पकाने में करते हैं. गैस संयंत्र से निकलने वाले अवशेष को जैविक खाद के रूप में खेतों में डाला जाता है. इससे नेपियर घास की खेती होती है. इस तरह चारा, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, गोबर गैस और जैविक खेती एक-दूसरे से जुड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का चक्र बना रहे हैं.

खेत में पर्याप्त चारा मिलने से खरीदारी में होती है बचत

किसान योगेंद्र महतो कहते हैं कि बीएमसी की स्थापना और रांची तक दूध की आपूर्ति में नेपियर घास की बड़ी भूमिका है. खेत में पर्याप्त चारा मिलने से खरीदारी का खर्च बचता है और कम लागत में पशुपालन संभव होता है.

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बिक्री की व्यवस्था होने से ग्रामीणों की आमदनी बढ़ी

मिथुन महतो, कौशिल देवी, कमली देवी, सरून देवी, आशा देवी, बुधनी देवी और पुरनी देवी समेत अन्य पशुपालकों का कहना है कि नेपियर घास ने पशुपालन को आसान और लाभकारी बनाया है. वर्षों तक चारा उपलब्ध रहने और दूध की बिक्री की व्यवस्था होने से ग्रामीणों की आमदनी बढ़ी है.

जाराडीह ने डाली बदलाव की बुनियाद

जाराडीह की कहानी बताती है कि खेती, पशुपालन, जैविक खाद और दुग्ध विपणन को एक साथ जोड़कर गांव में रोजगार और आय के स्थायी अवसर तैयार किए जा सकते हैं. यह मॉडल ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने और पलायन कम करने की दिशा में भी मिसाल बन सकता है.

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