कभी रोप-वे से ट्रॉली में पावर प्लांट जाता था कोयला
Author Prabhat khabar digital desk
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राकेश वर्मा, बेरमो : एक समय था जब बेरमो में कोयला ट्रांसपोर्टिंग के लिए आज की तरह इतने हाइवा ट्रक नहीं हुआ करते थे. खासकर कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के पूर्व खानगी मालिकों के समय कोयला खदानों से कोयला ढुलाई के लिए इक्का-दुक्का ही ट्रक होते थे. कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद 80 के […]
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राकेश वर्मा, बेरमो : एक समय था जब बेरमो में कोयला ट्रांसपोर्टिंग के लिए आज की तरह इतने हाइवा ट्रक नहीं हुआ करते थे. खासकर कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के पूर्व खानगी मालिकों के समय कोयला खदानों से कोयला ढुलाई के लिए इक्का-दुक्का ही ट्रक होते थे.
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कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद 80 के दशक तक भी यहां ट्रकों की संख्या काफी कम थी. उस वक्त एशिया महादेश की पहली कोकिंग कोल वाशरी के रूप में करगली वाशरी अस्तित्व में आया.
उस जमाने में कोयला लोहे के रोप-वे के सहारे ट्रॉली के माध्यम से बोकारो थर्मल स्थित डीवीसी के ए पावर प्लांट पहुंचाया जाता था. इस प्लांट में डीवीसी की एकमात्र कैप्टिव कोल माइंस बेरमो स्थित डीवीसी बेरमो माइंस से भी ट्रॉली से कोयला जाता था. घुटियाटांड़ से करगली कोलियरी के चानक व चलकरी कोलियरी में रोपवे से बालू जाता था.
राष्ट्रीयकरण के बाद बदला परिवहन का नक्शा : राष्ट्रीयकरण के बाद कोयले की ट्रांसपोर्टिंग ने रफ्तार पकड़ी. अब तो कोयले की मांग भी पहले की अपेक्षा काफी बढ़ गयी है. बेरमो स्थित पावर प्लांटों के अलावा देश के कई राज्यों के पावर प्लांटों में रेलवे रैक से यहां से कोयले को भेजा जाता है. साथ ही सड़क मार्ग से भी कोल ट्रांसपोर्टिंग काफी बढ़ गयी है.
एक आकलन के अनुसार पूरे बेरमो में पांच हजार से ज्यादा हाइवा ट्रांसपोर्टिंग में लगे हुए हैं. 70 के दशक में बेरमो कोयलांचल में एक ट्रक रखनेवाले को भी काफी हैसियत वाला समझा जाता था.
बेरमो कोयलांचल में ऐसे ट्रांसपोर्टर व कंपनियां हैं जिनके पास भी पहले काफी कम ट्रक कम हुआ करते थे. जैसे-जैसे व्यापार बढ़ता गया उनके पास ट्रक, डंपर, लोडर, पोक लेन व पे लोडर बढ़ते चले गये. ट्रांसपोर्टरों के अलावा अब तो बेरमो में सैकड़ों लोग कई-कई ट्रकों के मालिक हैं. अब तो किसी भी सीसीएल कर्मी के रिटायरमेंट के बाद उनका बेरोजगार पुत्र यहां सबसे पहले ट्रक खरीद लेता है.
ट्रांसपोर्टिंग वाहनों की बाढ़
पुराने लोग बताते हैं कि पहले कोयला ट्रांसपोर्टिंग इतनी नहीं थी और ना ही इतने ट्रक होते थे. गिन-चुने ट्रांसपोर्टर हुआ करते थे. कोयलांचल की अलग-अलग कोलियरियों में कोयले की ट्रांसपोर्टिंग का इनका काम होता था. पहले कोयले के डीओ का भी इतना प्रचलन नहीं था, पर 90 के दशक के बाद से कोयलांचल में इस धंधे ने भी काफी जोर पकड़ा.
कोयलांचल के तीनों एरिया में चलनेवाले कोयला के लोकल सेल में भी पांच हजार से ज्यादा ट्रक लगे हुए हैं. अस्तित्व विहीन फैक्ट्रियों के नाम पर पीएलसी के तहत कोयले का उठाव कर कोयलांचल के लोगों ने करोड़ों कमाये.
गिरिडीह भी जाता था कोयला : बेरमो की सौ साल पुरानी बोकारो कोलियरी का कोयला करगली वाशरी के अलावा गिरिडीह भी जाता था. इस कोयले का उपयोग हार्ड कोक प्लांट के अलावा अलकतरा बनाने में भी होता था.
बाद में यहां का कोयला सीसीएल की स्वांग परियोजना भी जाने लगा. पहले घुटियाटांड़ बालू बैंकर से ट्रॉली से रोप-वे के जरिये बालू चलकरी माइंस भेजा जाता था. इस बालू का उपयोग भूमिगत खदानों से कोयला निकासी के बाद उसे भरने (स्टोकिंग) के लिए किया जाता था.
90 के दशक में रोपवे पर लगा ग्रहण
डीवीसी बेरमो माइंस से बोकारो ताप विद्युत केंद्र तक चलने वाला रोपवे 1994-95 के आसपास बंद हुआ. बंद होने का कारण डीवीसी बेरमो माइंस से कोयले का उत्पादन कम हो जाना तथा बड़े-बड़े ट्रांसपोर्टरों द्वारा ट्रकों से परिवहन शुरू कर दिया जाना था. जानकारी के अनुसार करीब एक सौ ट्रॉली रोपवे से चलती थी.
इसे एक बार डीवीसी बेरमो माइंस से बीटीपीएस तक रोटेट करने में तकरीबन दो घंटे का समय लगता था. एक ट्रॉली में .7 टन कोयला लोड होता था. यह कोयला डीवीसी बेरमो माइंस से रोपवे के जरिये सीधे बीटीपीएस प्लांट के कोल मिल होते हुए ब्वॉयलर में जाता था. डीवीसी बेरमो माइंस से रोपवे के द्वारा ही पहले करगली वाशरी से मिडलिंग कोल भी जाता था.
मिडलिंग कोल का हॉपर डीवीसी बेरमो माइंस में ही था. यहां से डीवीसी बेरमो माइंस का कोयला तथा करगली वाशरी का मिडलिंग कोल, दोनों रोपवे से बीटीपीएस जाता था. घुटियाटांड़ से करगली कोलियरी के चानक व चलकरी कोलियरी में रोपवे से बालू का परिवहन 1990 के आसपास बंद हो गया.
बाहरी लोगों के आकर्षण का केंद्र थी ट्रॉली
पहले बेरमो की कोयला खदानों को देखने दूर-दूर से लोग आते थे. कोयला व बालू लेकर चलनेवाली ट्रॉली कोयलांचल में आकर्षण का केंद्र थी. इसके अलावा भूमिगत खदानों में होने वाले खनन को लेकर भी दिलचस्पी थी. इसी तरह कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण से पूर्व बेरमो में लाल बंगला काफी चर्चित था. इसे राजा (खानगी मालिक) ने अंग्रेजों ने खरीदा था. लाल बंगला आज सीसीएल के ढोरी महाप्रबंधक का कार्यालय है.
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