हाजीपुर : वैशाली जिले की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है, लेकिन विडंबना देखिए कि यहां के किसान ही सबसे ज्यादा बदहाल हैं. वैशाली को जिला बने 44 साल हो गये. लेकिन किसानों की तकदीर नहीं बदली. उपजाऊ भूमि, कृषि के अनुकूल वातावरण, प्रचुर मात्रा में जल और श्रम संसाधन के बावजूद यहां किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है.
वैशाली राज्य का ऐसा जिला है जो हर साल बाढ़ और सुखाड़ की तबाही झेलता है. जिले के अधिकतर हिस्सों में सिंचाई के अभाव में एक तरफ किसानों की फसलें सूख जाती है तो दूसरी ओर बाढ़ में डूब जाती है. ऐसे में जिले के लाखों किसान तबाह हो जाते हैं.
जल प्रबंधन से खेतों को मिलेगा पर्याप्त पानी : इस कृषि प्रधान जिले में जल प्रबंधन की भारी अहमियत है. जानकारों के मुताबिक प्रशासन अगर ठोस प्रबंध नीति बनाकर जल भंडारण की योजनाओं पर काम करे तो जिले में न सिर्फ सिंचाई की समस्या दूर होगी, बल्कि बाढ़ और सुखाड़ से भी लड़ना आसान होगा.
जानकार बताते हैं कि जल संचय और प्रबंधन के अभाव में ही पर्याप्त पानी के बावजूद खेतों की सिंचाई नहीं हो पाती. देखा जाता है कि बरसात के मौसम में जिले के अधिकतर हिस्से जलाच्छादित रहते हैं, लेकिन गेहूं के मौसम में सिंचाई की व्यवस्था नहीं हो पाती है. जिले में गंगा, गंडक और वर्षा के पानी का सही उपयोग हो तो यहां खेतों में फसलें लहलहा उठेंगी.
नहरें व तालाबों का करना होगा जीर्णोद्धार : जिले में गंडक प्रोजेक्ट का हाल किसी से छिपा नहीं है. सिंचाई को लेकर करोड़ों रुपये खर्च कर कई परियोजनाएं बनीं, लेकिन वे कारगर नहीं हो सकीं. जिले में अनेक नहर और बांध बनाये गये, लेकिन नहरों से गाद निकासी की व्यवस्था नहीं होने के कारण शायद ही कोई नहर सिंचाई के काम आती हो.
जानकारों का कहना है कि नहरों का निर्माण भी मनमाने ढंग से होने के कारण इनका लाभ नहीं मिल सका. जिले में जहां से भी नहरें गुजरी उसका रास्ता तय करने में इलाके के संपन्न और प्रभुत्वशाली लोगों की अहम भूमिका रही. उनके हितों को ही देखा गया और इसके तकनीकी पहलू की अनदेखी की गयी.
सूखी पड़ी हैं जिले की अधिकतर नहरें : आज हालत यह है कि जिले की प्राय: नहरें न सिर्फ सूखी पड़ी हैं, बल्कि झाड़-झंखाड़ से भरती जा रही हैं. यही हाल तालाबों का भी है. जिले में सड़कों के किनारे जो भी तालाब थे, आज वहां मकान खड़े हो गये हैं. जो तालाब बचे भी हैं, वह सूख गये हैं और उनका अस्तित्व कब तक रहेगा यह कहना मुश्किल है.
इसके अलावा बरसात के समय मिट्टी कट कर तालाबों में आने से अधिकतर तालाब समतल हो गये. जानकारों के अनुसार जिले में नहरों की उड़ाही और सभी सरकारी तालाबों का जीर्णोद्धार किया जाना चाहिए. इससे कृषि के साथ मत्स्यपालन को भी बढ़ावा मिलेगा. जिले में 95 प्रतिशत छोटे एवं सीमांत किसानों की जरूरतों को ध्यान में रख कर जल प्रबंधन पर काम करने की आवश्यकता है.
कुछ महत्वपूर्ण बिंदु : वैशाली जिले की भूमि गंगा और गंडक का मैदानी क्षेत्र होने के कारण कृषि के लिए उपयुक्त है. बरसात के मौसम में नदियों में बाढ़ तथा जल प्लावन से काफी भू-भाग प्रभावित होता है. जिले का कुल क्षेत्रफल 2039 वर्ग किलोमीटर है. कृषि आधारित इस जिले के कुल 199049.46 हेक्टेयर में 152348.14 हेक्टेयर भूमि कृषि के लिए उपयुक्त है, जबकि 29304 हेक्टेयर भूमि कृषि के लिए उपलब्ध नहीं है. कृषि के लायक 14485 हेक्टेयर भूमि बंजर है, जिसे सिंचाई से आबाद किया जा सकता है.
जिले में पर्याप्त मात्रा में जल स्रोत उपलब्ध हैं.
जमीन की सतह पर और जमीन के नीचे पर्याप्त जल भंडार है. जिले में सरकारी क्षेत्र में 431.25 हेक्टेयर एवं निजी क्षेत्र में 440.00 हेक्टेयर जल क्षेत्र है. जिले में नदियों की लंबाई 150 किलोमीटर है. जिले में सिंचाई के साधन के रूप में राजकीय नलकूप तथा नहरें हैं. 90 प्रतिशत राजकीय नलकूप बंद या बेकार हैं. पांच से 10 प्रतिशत किसानों के पास ही निजी नलकूप के साधन है. नहरों में पानी नहीं है.
जिले की प्रमुख फसलें धान, गेहूं, मक्का एवं तंबाकू हैं. मुख्य दलहन फसलें अरहर, मूंग तथा उरद हैं. तेलहन में मुख्यत: सरसों की खेती होती है. उद्यान के क्षेत्र में भी यह जिला धनी है. यहां आम, लीची, केला, अमरूद आदि के उद्यान बड़े पैमाने पर हैं. सब्जियों में आलू, टमाटर, गोभी, भिंडी, बैगन, कद्दू, नेनुआ आदि की खेती होती है.
क्या कहते हैं जानकार
जल प्रबंधन पर यदि योजना बना कर सही ढंग से काम हो, तो वैशाली जिले को बाढ़ की तबाही और सुखाड़ की मार से बचाया जा सकता है. दूरदर्शिता के अभाव में गंडक प्रोजेक्ट की योजनाएं भी कारगर नहीं हो सकीं.
ब्रज कुमार पांडेय, चिंतक व समाज विज्ञानी
वैशाली जिले में कृषि के लिए अनुकूल जलवायु, पर्याप्त जल की उपलब्धता, उर्वर भूमि एवं मानव श्रम के बावजूद खेती-किसानी के कार्यों से जीवन-यापन मुश्किल हो रहा है. जल प्रबंधन के जरिये यदि खेतों तक सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध करा दिया जाये, तो कृषि से तकदीर संवारी जा सकती है.
जितेंद्र सिंह, सदस्य शासी निकाय, आत्मा वैशाली
भूमिगत जल पर हमारी निर्भरता बढ़ती जा रही है. इससे भविष्य में भयावह स्थिति पैदा होगी. बारिश के पानी का संग्रह कर सिंचाई और पेयजल के लिए इसके उपयोग की योजना बनायी जानी चाहिए. जल की उपलब्धता बढ़ाने के लिए काम करने की जरूरत है.
अनिल लोदीपुरी, युवा किसान गोरौल