ऐतिहासिक ''भीमसेन का पल्ला'' बदहाली पर बहा रहा आंसू

Updated at : 20 Feb 2018 1:01 AM (IST)
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ऐतिहासिक ''भीमसेन का पल्ला'' बदहाली पर बहा रहा आंसू

सम्राट अशोक द्वारा 200 बीसी में अशोक स्तंभ बनवाया गया था यात्रा वृतांत के आधार पर 1958 में इन दोनों स्थलों की खुदाई की गयी थी वैशाली : जिले के ऐतिहासिक स्थल अशोक स्तंभ के समीप स्थित भीमसेन का पल्ला या भार सार अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. यहां चारों ओर जंगल झाड़ […]

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सम्राट अशोक द्वारा 200 बीसी में अशोक स्तंभ बनवाया गया था

यात्रा वृतांत के आधार पर 1958 में इन दोनों स्थलों की खुदाई की गयी थी
वैशाली : जिले के ऐतिहासिक स्थल अशोक स्तंभ के समीप स्थित भीमसेन का पल्ला या भार सार अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. यहां चारों ओर जंगल झाड़ और पसरी गंदगी इस ऐतिहासिक स्थल की उपेक्षा की गवाही दे रही है. ऐसी मान्यता है कि भगवान बुद्ध ने अपने जीवन का 46वां वर्षावास महावन के मध्य स्थित कुटरीशाला (कुटागार शाला) में व्यतीत किया था. इसकी चर्चा महाली सूत्र में वर्णित है.
यह वही स्थान है जहां सम्राट अशोक द्वारा 200 बीसी में अशोक स्तंभ बनवाया गया था. इसी क्षेत्र में शालवन था, जहां भगवान बुद्ध ने अपने परिनिर्वाण की पूर्व घोषणा 90 दिन पहले की थी. आज उस जगह को सरैया कहते हैं.
शाल वृक्ष को अंग्रेजी में सोरेया रोबुस्टा कहते हैं. इससे यह विदित होता है कि वर्तमान समय में भौगोलिक स्थिति पूर्ववत ही है, क्योंकि महात्मा बुद्ध ने 21वां और 46वां वर्षावास वैशाली में व्यतीत किया था. तब का पीपल वन अब पिपरा हो गया है. इसी तरह भगवान को जिस वन से मधु लेकर बंदरों ने अर्पित किया था, वह अभी मधुबन के नाम से जाना जाता है, जो कोल्हुआ से दक्षिण पश्चिम में स्थित है. आम्रपाली का आम्रवन, कदंब वन, कमल वन, केतकी वन और इसी तरह से विमल कीर्ति सरोवर के निकट अशोक वन इत्यादि वैशाली के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हैं, जो भगवान बुद्ध के जीवन काल से संबंधित हैं.
चाइनीज यात्री ने अपने यात्रा वृतांत में लिखा था कि कोल्हुआ में अशोक स्तंभ के निकट स्थित कुटागार शाला बौद्ध स्तूप से पश्चिम और दक्षिण दिशा पर स्थित दो बौद्ध स्तूप दिखा था. तब कुछ बौद्ध भिक्षु भी वहां रहते थे. इनके यात्रा वृतांत के आधार पर 1958 में इन दोनों स्थलों की खुदाई की गयी थी. खुदाई के दौरान मिले अवशेषों के आधार पर यह प्रमाणित हो चुका है कि यह दो बौद्ध स्तूप ही हैं,
जिन्हें इन दिनों भार सार या भीमसेन का पल्ला के नाम से जाना जाता है. स्थानीय लोगों द्वारा इस ऐतिहासिक स्थल की बुरी स्थिति बना दी गयी है. सरकार का भी इस पर कोई ध्यान नहीं है. इस स्थल पर आने वाले अंतरराष्ट्रीय बौद्ध तीर्थ यात्री सरकार द्वारा उपेक्षित इस महत्वपूर्ण धरोहर की बदहाली को देखकर काफी दुखी होते हैं.
क्या कहते हैं जानकार
ख्याति प्राप्त वैशाली, जो विभिन्न धर्मों का समन्वय स्थल है, जहां सबसे अधिक बौद्ध श्रद्धालुओं का आगमन होता है. यहां के दर्शनीय और पूजनीय स्थलों की दयनीय स्थिति देखकर दुख होता है. इस ऐतिहासिक स्थल के जीर्णोंद्धार के लिए सरकार को गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए.
डॉ रामनरेश राय, प्राकृत भाषा विभागाध्यक्ष, एबीएस कॉलेज, लालगंज
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