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बरैल गांव की दुर्गा मैया का तांत्रिक पद्धति से होती है पूजा

Updated at : 27 Sep 2025 6:05 PM (IST)
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बरैल गांव की दुर्गा मैया का तांत्रिक पद्धति से होती है पूजा

राजस्थानी शैली में भव्य मंदिर का निर्माण

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सुपौल. सदर प्रखंड के बरैल गांव सदियों से आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है. यहां स्थित दुर्गा मंदिर का इतिहास वर्ष 1803 से जुड़ा है, जब काशी दत्त सिंह को मां दुर्गा स्वप्न में प्रकट होकर गांव लाने का संकेत दिया था. तभी से यह मंदिर हजारों-लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है. ग्रामीणों के अनुसार मां दुर्गा को लाने के दौरान हर कदम पर बलि की परंपरा निभाई गई थी. छाग (बकरे) की बलि कठिन होने पर झींगा (केकड़ा) की बलि दी गई और आश्चर्यजनक रूप से उससे भी खून की धार निकली. यह घटना आज भी ग्रामीणों की श्रद्धा और विश्वास की नींव मानी जाती है. बरैल की दुर्गा मैया की पूजा सामान्य विधि से नहीं, बल्कि तांत्रिक परंपरा से होती है. हर साल नवरात्र में हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. खासकर नवमी के दिन एक हजार से अधिक छाग की बलि दी जाती है. सुपौल ही नहीं, बल्कि अररिया, पूर्णिया, मधेपुरा, दरभंगा और नेपाल तक से भक्त मन्नतें पूरी होने पर बलि देने आते हैं. राजस्थानी शैली में भव्य मंदिर का निर्माण पहले यहां झोपड़ीनुमा मंदिर था, जो अब चौथी बार पुनर्निर्मित होकर राजस्थानी स्थापत्य कला का अनूठा उदाहरण बन गया है. ग्रामीणों और चंदे के सहयोग से तैयार इस मंदिर का निर्माण राजस्थान से आए कारीगरों ने किया है. दीवारों पर पत्थर की नक्काशी और कलाकृतियां भक्तों को पौराणिक व राजस्थानी मंदिरों का अनुभव कराती हैं. सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक नवरात्र में बरैल का यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं बल्कि सांस्कृतिक समरसता और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक बन जाता है. मेले जैसे माहौल में लोकगीत, भक्ति संगीत और पारंपरिक कार्यक्रम पूरे वातावरण को गुंजायमान कर देते हैं. यही कारण है कि बरैल की दुर्गा मैया आज सुपौल ही नहीं, बल्कि पूरे कोसी क्षेत्र की आस्था का अद्वितीय प्रतीक बन चुकी हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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RAJEEV KUMAR JHA

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By RAJEEV KUMAR JHA

RAJEEV KUMAR JHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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