सीवान के हुसैनगंज में 53 साल पुरानी कुश्ती दंगल की परंपरा, बाबा रामदास अयोध्या ने जीता मुकाबला

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दंगल कुश्ती देखने हजारों कि संख्या में पहुंचे कुश्ती प्रेमी

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हुसैनगंज प्रखंड के सिधवल पंचायत में 53 वर्षों से चली आ रही महावीरी दंगल की परंपरा का आज समापन हुआ. दूर-दूर से आए पहलवानों ने अपना दमखम दिखाया, जिसमें बाबा रामदास अयोध्या विजयी रहे. यह आयोजन खेल संस्कृति को जीवित रखने का एक प्रयास है.

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Wrestling Tournament: हुसैनगंज प्रखंड क्षेत्र की सिधवल पंचायत के साढ़ोखोर गांव में गुरुवार को महावीरी मेला के समापन के बाद कुश्ती दंगल का भव्य आयोजन किया गया. पंचायत के मुखिया संदेश साह के नेतृत्व में आयोजित इस पारंपरिक दंगल में दूर-दराज से आए नामचीन पहलवानों ने अपने दांव-पेंच और दमखम का शानदार प्रदर्शन किया. कुश्ती देखने के लिए आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में पुरुष और महिलाएं पहुंचे.

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53 वर्षों से चली आ रही है दंगल की परंपरा

मुखिया संदेश साह ने बताया कि साढ़ोखोर गांव में कुश्ती दंगल की परंपरा पिछले 53 वर्षों से लगातार चली आ रही है. प्रत्येक वर्ष महावीरी मेला के बाद दंगल का आयोजन किया जाता है. इसमें बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और नेपाल तक से पहलवान हिस्सा लेने पहुंचते हैं.

इस वर्ष भी करीब 25 से 30 पहलवानों ने अखाड़े में उतरकर अपनी कुश्ती कला का प्रदर्शन किया. अखाड़े में पहलवानों के बीच एक से बढ़कर एक मुकाबले हुए. पहलवानों ने दांव-पेंच और जोर आजमाइश से दर्शकों का खूब मनोरंजन किया.

पहलवान के चित करते ही तालियों से गूंज उठा मैदान

मुकाबले के दौरान जैसे ही कोई पहलवान अपने प्रतिद्वंद्वी को चित करता, पूरा मैदान तालियों और उत्साह से गूंज उठता. कई दौर की जोरदार कुश्ती के दौरान दर्शकों में भी खासा उत्साह देखने को मिला. लोगों ने पहलवानों का तालियों से उत्साह बढ़ाया.

बाबा रामदास अयोध्या ने मारी बाजी

कई दौर के मुकाबलों के बाद बाबा रामदास अयोध्या ने शानदार प्रदर्शन करते हुए बाजी अपने नाम की. उनकी जीत पर दर्शकों ने तालियों के साथ उनका उत्साह बढ़ाया. आयोजन समिति की ओर से विजेता पहलवान को सम्मानित भी किया गया.

इस अवसर पर मुखिया संदेश साह सहित पंचायत के जनप्रतिनिधि, स्थानीय ग्रामीण और बड़ी संख्या में दर्शक मौजूद रहे.

खेल संस्कृति को बढ़ावा देने की पहल

आयोजकों ने कहा कि कुश्ती दंगल केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि गांव की वर्षों पुरानी परंपरा और खेल संस्कृति को जीवित रखने का प्रयास भी है. इस तरह के आयोजनों से ग्रामीण क्षेत्र के युवाओं में खेल के प्रति रुचि बढ़ती है और पहलवानी की पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है.

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