शिवहर: कुर्बानी और भाईचारे का पर्व है बकरीद, बाजारों में दिख रहा उत्साह
Published by : Sarfaraz Ahmad Updated At : 24 May 2026 1:39 PM
प्रतीकात्मक तस्वीर
शिवहर जिले में बकरीद को लेकर बाजारों में रौनक बढ़ गई है. लोग कुर्बानी के लिए बकरे खरीद रहे हैं और ईद-उल-अजहा की तैयारियों में जुटे हैं. पढ़ें पूरी खबर...
शिवहर के पिपराही से मकसूद आलम की रिपोर्ट
Sheohar News: अरबी महीने की 10वीं जिल्हिज्जा को दुनिया भर के मुसलमान ईद-उल-अजहा (बकरीद) का त्योहार मनाते हैं. इस दिन मुसलमान ईद की नमाज अदा करते हैं और अल्लाह की राह में जानवरों की कुर्बानी देते हैं. यह पर्व हजरत इब्राहिम और उनके बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी और अल्लाह के प्रति समर्पण की याद दिलाता है.
बाजारों में बढ़ी रौनक, बकरों की खरीदारी तेज
शिवहर जिले में भी बकरीद को लेकर मुस्लिम समाज के लोगों में उत्साह का माहौल है. बाजारों में इन दिनों बकरों की खरीदारी तेज हो गई है. लोग अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार कुर्बानी के लिए बकरे, भेड़ और अन्य जानवर खरीद रहे हैं.
पिपराही, शिवहर और आसपास के क्षेत्रों के बाजारों में सुबह से देर शाम तक लोगों की भीड़ देखी जा रही है. बच्चों और युवाओं में भी त्योहार को लेकर खास उत्साह है. कपड़ों, टोपी, इत्र और सेवइयों की दुकानों पर भी अच्छी खरीदारी हो रही है.
क्यों मनाई जाती है ईद-उल-अजहा
ईद-उल-अजहा इस्लाम धर्म का एक प्रमुख और पवित्र त्योहार है, जो त्याग, आस्था और समर्पण का प्रतीक माना जाता है. इस्लामी इतिहास के अनुसार अल्लाह ने हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की परीक्षा लेने के लिए उन्हें अपने सबसे प्रिय वस्तु की कुर्बानी देने का हुक्म दिया था.
हजरत इब्राहिम ने समझा कि दुनिया में उनके लिए सबसे प्रिय उनके बेटे हजरत इस्माइल हैं. उन्होंने अल्लाह के हुक्म का पालन करने का निर्णय लिया. जब उन्होंने अपने बेटे को इस बारे में बताया तो हजरत इस्माइल ने भी अल्लाह की रजा के लिए खुशी-खुशी कुर्बानी देने की सहमति दे दी.
जब हजरत इब्राहिम अपने बेटे की कुर्बानी देने लगे, तब अल्लाह उनकी अटूट आस्था और समर्पण से खुश हो गए और हजरत इस्माइल की जगह एक मेढ़ा भेज दिया. उसी घटना की याद में ईद-उल-अजहा मनाई जाती है और मुसलमान जानवरों की कुर्बानी देते हैं.
कुर्बानी और भाईचारे का संदेश
इस पर्व के अवसर पर आर्थिक रूप से सक्षम मुसलमान अल्लाह को खुश करने के लिए जानवरों की कुर्बानी देते हैं. कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटा जाता है. एक हिस्सा परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए तथा तीसरा हिस्सा गरीबों और जरूरतमंदों में बांटा जाता है.
इस दिन मुसलमान नए कपड़े पहनकर ईदगाह और मस्जिदों में विशेष नमाज अदा करते हैं तथा देश और दुनिया में अमन-चैन की दुआ मांगते हैं.
हज यात्रा से भी जुड़ा है पर्व
ईद-उल-अजहा मक्का में होने वाली वार्षिक हज यात्रा के समापन का भी प्रतीक माना जाता है. यही वजह है कि इस पर्व का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है.
शिवहर जिले में भी मुस्लिम बिरादरी के लोग बकरीद की तैयारियों में जुटे हुए हैं. घरों की साफ-सफाई, खरीदारी और कुर्बानी की तैयारियां अंतिम दौर में हैं. लोगों ने इस पर्व को आपसी भाईचारे और इंसानियत का संदेश देने वाला त्योहार बताया.
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लेखक के बारे में
By Sarfaraz Ahmad
सरफराज अहमद IIMC से प्रशिक्षित पत्रकार हैं. राजनीति, समाज और हाइपरलोकल मुद्दों पर लिखते हैं. क्रिकेट और सिनेमा में गहरी रुचि रखते हैं. बीते तीन वर्षों से मीडिया क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर की डिजिटल टीम के साथ कार्यरत हैं।
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