दो साल के बेटे की हत्या की आरोपी मां कैसे बाइज्जत बरी हुई? साढ़े पांच साल जेल में रही बबली की पूरी कहानी

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सबूत के अभाव में अदालत ने किया रिहा। सोर्स- एआई।

पश्चिम बंगाल से बेटे का भविष्य संवारने आई बबली खातून पर उसी मासूम की हत्या का आरोप लगा, जिसके चलते वह 5.5 साल जेल में रही. डीएनए और फोरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर बचाव पक्ष ने कैसे सबूतों पर सवाल उठाए और अंततः अदालत ने उन्हें बाइज्जत रिहा किया.

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Mother Acquitted in Son Murder Case Saran: जिस दो साल के बेटे का भविष्य संवारने का सपना लेकर बबली खातून पश्चिम बंगाल से सारण के डोरीगंज पहुंची थी, कुछ ही समय बाद उसी मासूम की हत्या का आरोप उसके सिर आ गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और वह साढ़े पांच साल तक जेल में बंद रही. लेकिन जब इस मामले का फैसला आया, तो अदालत ने उसे निर्दोष पाते हुए सम्मानपूर्वक रिहा करने का आदेश दे दिया.

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सवाल है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस महिला पर अपने ही बेटे की हत्या का आरोप लगा था, उसके खिलाफ अदालत में आरोप साबित नहीं हो सके. पांच साल से ज्यादा चली इस कानूनी लड़ाई में अभियोजन की ओर से सात गवाह पेश हुए, लेकिन बचाव पक्ष ने पोस्टमार्टम और फोरेंसिक रिपोर्ट समेत उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत के सामने सवाल खड़े किए कि आखिर बबली को हत्या से जोड़ने वाला स्पष्ट सबूत कहां है.

अंततः प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनंत कुमार सिंह ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और केस की पत्रावली में मौजूद साक्ष्यों का परिशीलन करने के बाद बबली खातून को निर्दोष पाया और उसकी सम्मानपूर्वक रिहाई का आदेश दिया.

बेटे का भविष्य संवारने निकली थी बबली, प्रेमी के साथ पहुंची डोरीगंज

मुख्य डिफेंस काउंसिल अधिवक्ता पूर्णेन्दु रंजन के अनुसार, बबली खातून पश्चिम बंगाल की रहने वाली है. उसका पहले विवाह हुआ था और उसका दो साल का एक बेटा था. वर्ष 2021 में वह अपने प्रेमी राहुल के साथ पश्चिम बंगाल से सारण के डोरीगंज आयी थी.

बचाव पक्ष के अनुसार, राहुल बबली से शादी करना चाहता था और उस पर शादी के लिए दबाव बना रहा था. इसी दौरान बच्चे को रास्ते से हटाने की साजिश रची गयी. आरोप है कि मौका पाकर बच्चे की गला दबाकर हत्या कर दी गयी और हत्या का आरोप बबली पर आ गया.

इसके बाद पुलिस ने बबली को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया. राहुल के मामले में अभी अनुसंधान चल रहा है.

जेल में रोते हुए सुनायी थी पूरी कहानी

बबली के मामले में मोड़ तब आया, जब जिला विधिक सेवा प्राधिकार के प्रतिनिधियों की जेल में उससे मुलाकात हुई. तत्कालीन जिला जज पुनीत कुमार गर्ग और जिला विधिक सेवा प्राधिकार के मुख्य डिफेंस काउंसिल पूर्णेन्दु रंजन मंडल कारा विजिट के लिए पहुंचे थे. इसी दौरान बबली ने रोते हुए अपनी आपबीती सुनायी.

बबली के अनुसार, राहुल उसे बहला-फुसलाकर पश्चिम बंगाल से डोरीगंज लाया था. वह अपने मासूम बेटे का भविष्य बेहतर बनाना चाहती थी. पश्चिम बंगाल में पुराने परिवार से मिली प्रताड़ना से परेशान होकर वह राहुल के साथ डोरीगंज आयी थी.

लेकिन डोरीगंज पहुंचने के बाद राहुल उस पर जबरन शादी का दबाव बनाने लगा. बचाव पक्ष के अनुसार, राहुल शादी से पहले बच्चे की हत्या करने की साजिश रच रहा था. इसी बीच बच्चे की हत्या हो गयी और बबली पर ही इसका आरोप लग गया.

बबली के पास पैरवी के लिए पैसे नहीं थे, LADCS ने संभाला केस

बबली आर्थिक रूप से कमजोर थी. उसके माता-पिता का पहले ही निधन हो चुका था और परिवार में भी उसका साथ देने वाला कोई दूसरा सदस्य नहीं था. ऐसे में उसके केस की उचित पैरवी नहीं हो पा रही थी और फैसला लगातार लंबित होता जा रहा था.

आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण बबली का केस जिला विधिक सेवा प्राधिकार, सारण के अंतर्गत संचालित लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम को सौंपा गया. मुख्य डिफेंस काउंसिल अधिवक्ता पूर्णेन्दु रंजन ने उसकी ओर से मामले की पैरवी शुरू की.

बचाव पक्ष ने केस में उपलब्ध तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी पहलुओं को अदालत के सामने मजबूती से रखा. अभियोजन की ओर से कुल सात साक्षियों की गवाही करायी गयी.

सात गवाहों की गवाही हुई, लेकिन हत्या से जोड़ने वाला स्पष्ट सबूत नहीं मिला

सुनवाई के दौरान अदालत ने सभी गवाहों से मामले के बारे में विस्तार से जानकारी ली. बबली को घटना के बाद डोरीगंज थाना के चौकीदार लगन मांझी ने गिरफ्तार किया था. उनकी गवाही भी इस मामले में हुई.

डोरीगंज थाना के तत्कालीन थानाध्यक्ष संजय कुमार इस केस के सातवें गवाह थे. उनकी गवाही को भी मामले में अहम माना गया.

बचाव पक्ष ने अदालत में पोस्टमार्टम और फोरेंसिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि मृतक बच्चे के शरीर से बबली खातून के नाखून या अन्य कोई निशान नहीं मिले थे. रिपोर्ट में बच्चे की मौत गला दबाने से होने की बात थी, लेकिन बबली द्वारा हत्या किये जाने का कोई स्पष्ट साक्ष्य सामने नहीं आया.

बचाव पक्ष ने यह भी अदालत के सामने रखा कि बच्चे का शव लावारिस हालत में मिला था. ऐसे में बबली द्वारा बच्चे की हत्या किये जाने से जोड़ने वाला स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं था. यही बिंदु बचाव पक्ष की दलील का अहम हिस्सा रहा.

फैसला आने से ठीक पहले बदल गया जिला जज, फिर रुक गया जजमेंट

इस मामले में फैसला आने में भी लंबा वक्त लगा. मुख्य डिफेंस काउंसिल पूर्णेन्दु रंजन के अनुसार, 26 जुलाई को इस केस में जजमेंट आना था. लेकिन जजमेंट आने से ठीक एक दिन पहले तत्कालीन जिला जज का तबादला हो गया. इसके बाद फैसला रुक गया.

बबली तब तक साढ़े पांच साल जेल में गुजार चुकी थी.

इसके बाद 27 अगस्त को अधिवक्ता पूर्णेन्दु रंजन किसी दूसरे केस में जिरह के लिए जिला जज के सामने पहुंचे. उस केस में उनकी पैरवी से प्रभावित होकर जिला जज ने बबली खातून के केस के बारे में भी जानकारी ली.

इसके बाद केस से जुड़े एक-एक पहलू को जाना गया. दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गयीं और उपलब्ध साक्ष्यों का परिशीलन किया गया.

अदालत में आरोप साबित नहीं हुए, बबली को मिली सम्मानपूर्वक रिहाई

मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अनंत कुमार सिंह ने बबली खातून को निर्दोष पाया. अदालत ने उसे सम्मानपूर्वक रिहा करने का आदेश पारित किया.

यानी जिस आरोप के चलते बबली को साढ़े पांच साल जेल में रहना पड़ा, सुनवाई के दौरान उसके खिलाफ ऐसा साक्ष्य साबित नहीं हो सका, जिससे यह स्थापित हो कि उसी ने अपने दो साल के बेटे की हत्या की थी.

बचाव पक्ष ने पोस्टमार्टम और फोरेंसिक रिपोर्ट, गवाहों की गवाही और केस में मौजूद अन्य तथ्यों के आधार पर यही दलील रखी कि बबली को हत्या से जोड़ने वाला कोई स्पष्ट साक्ष्य नहीं है. अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध साक्ष्यों के परिशीलन के बाद उसे निर्दोष मानते हुए रिहा कर दिया.

जेल से बाहर आते ही फिर सामने आया वही सवाल, अब कहां जाएगी बबली?

साढ़े पांच साल जेल में रहने के बाद बबली अब बाहर है. लेकिन उसके सामने आगे की जिंदगी का सवाल है. उसके माता-पिता नहीं हैं और परिवार में कोई दूसरा सदस्य भी नहीं है. वह लंबे समय से पश्चिम बंगाल नहीं गयी है.

बबली ने बताया कि पश्चिम बंगाल में सिलीगुड़ी के पास उसकी नानी का घर है. इसी को देखते हुए जिला जज ने उसे सुरक्षित उसके नानी के घर तक पहुंचाने का आदेश भी दिया है.

अपने दो साल के बेटे की हत्या के आरोप में साढ़े पांच साल जेल में रहने के बाद बबली अब अदालत से निर्दोष साबित होकर बाहर निकली है. इस पूरे मामले में जिला विधिक सेवा प्राधिकार की भूमिका अहम रही. आर्थिक रूप से कमजोर बबली को कानूनी सहायता मिली और मुख्य डिफेंस काउंसिल अधिवक्ता पूर्णेन्दु रंजन ने मामले की पैरवी की.

एक मां, जिसका कहना था कि वह अपने बेटे का भविष्य संवारना चाहती थी, उसी बेटे की हत्या के आरोप में वर्षों जेल में रही. अब अदालत के फैसले के बाद वह जेल से बाहर है और उसे अपने नानी के घर पहुंचाने का आदेश दिया गया है.

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