पूसा कृषि विश्वविद्यालय ने विकसित की मक्का की दो नई हाईब्रिड किस्में

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नई विकसित मक्का

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा ने मक्का की दो नई हाईब्रिड किस्में 'राजेंद्र हाइब्रिड मक्का 5' और 'राजेंद्र हाइब्रिड मक्का 6' विकसित की हैं. ये किस्में किसानों को अधिक उत्पादन, बेहतर रोग प्रतिरोधक क्षमता और बढ़ी हुई आय का अवसर प्रदान करेंगी.

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Samastipur News: डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिकों ने मक्का की दो नई हाईब्रिड किस्में विकसित की हैं. विश्वविद्यालय की 21वीं अनुसंधान परिषद की बैठक में राजेंद्र हाइब्रिड मक्का 5 और राजेंद्र हाइब्रिड मक्का 6 की पहचान की गई. इन दोनों प्रभेदों का विकास अखिल भारतीय समन्वित मक्का अनुसंधान परियोजना के तहत किया गया है.

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डॉ. अजय कुमार ने विकसित की नई किस्में

तिरहुत कृषि महाविद्यालय, ढोली के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग में कार्यरत फसल समन्वयक (मक्का) एवं मक्का प्रजनक डॉ. अजय कुमार ने इन दोनों संकर प्रभेदों का विकास किया है.

राजेंद्र हाइब्रिड मक्का 5 की विशेषताएं

राजेंद्र हाइब्रिड मक्का 5 रबी मौसम की मध्यम अवधि (135 से 140 दिन) में तैयार होने वाली स्टे-ग्रीन संकर किस्म है. इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

यह टर्सिकम लीफ ब्लाइट और मेडिस लीफ ब्लाइट रोगों के प्रति प्रतिरोधी है, जबकि तना छेदक और फॉल आर्मीवर्म के प्रति मध्यम प्रतिरोधी मानी गई है. इसके मोटे और नारंगी-पीले दाने बाजार के साथ-साथ पशुओं के हरे चारे के लिए भी उपयोगी हैं.

राजेंद्र हाइब्रिड मक्का 6 देगी अधिक उत्पादन

राजेंद्र हाइब्रिड मक्का 6 लगभग 150 से 160 दिन में तैयार होने वाली संकर किस्म है. इसकी उत्पादन क्षमता 108 से 110 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है.

यह सिंचित और वर्षा आधारित दोनों प्रकार की खेती के लिए उपयुक्त है तथा विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन करती है. इसके पीले और उच्च गुणवत्ता वाले दानों को बेहतर बाजार मूल्य मिलने की संभावना है.

किसानों की आय बढ़ाने में मिलेगी मदद

डॉ. अजय कुमार ने बताया कि इन दोनों नई संकर किस्मों का उद्देश्य किसानों को अधिक उत्पादन, जलवायु-अनुकूल खेती, रोग एवं कीटों से बेहतर सुरक्षा तथा अधिक लाभ उपलब्ध कराना है.

विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार ये किस्में पोल्ट्री एवं पशु आहार उद्योग के साथ-साथ जैव-एथेनॉल उत्पादन के लिए भी उपयोगी होंगी. इससे बिहार और पूर्वी भारत में मक्का उत्पादन बढ़ाने तथा किसानों की आय में वृद्धि करने में मदद मिलेगी.


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