पूसा में लीची स्टिंक बग पर प्रशिक्षण, वैज्ञानिकों ने किसानों को बताए निगरानी और जैविक नियंत्रण के तरीके

दीप जलाकर संगोष्ठी का शुभारंभ करते कुलपति डॉ पीएस पाण्डेय | Prabhat Khabar Network
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में लीची स्टिंक बग के प्रबंधन पर एक दिवसीय प्रशिक्षण आयोजित किया गया. इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों को स्टिंक बग के जीवन-चक्र, पहचान और प्रबंधन की जानकारी दी.
Samastipur News: डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के प्रसार शिक्षा निदेशालय एवं कीट विज्ञान विभाग की ओर से लीची स्टिंक बग के प्रबंधन को लेकर विद्यापति सभागार में एक दिवसीय प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम का उद्घाटन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी. एस. पाण्डेय ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया. राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर के निदेशक डॉ. विकास दास मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे. इस दौरान लीची स्टिंक बग पर आधारित प्रसार पुस्तिका का विमोचन भी किया गया.
लीची बिहार की पहचान, किसानों की आमदनी का प्रमुख स्रोत : कुलपति
कुलपति डॉ. पी. एस. पाण्डेय ने कहा कि लीची बिहार की पहचान के साथ किसानों की आमदनी का प्रमुख स्रोत है. पिछले कुछ वर्षों से स्टिंक बग के प्रकोप के कारण लीची उत्पादकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है. प्रयोगशाला में विकसित तकनीक तभी सार्थक होगी, जब उसका लाभ खेतों तक पहुंचे. उन्होंने कहा कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम लैब टू लैंड की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है.
कुलपति ने स्टिंक बग के नियंत्रण के लिए वैज्ञानिकों, कृषि विज्ञान केंद्रों और किसानों के बीच समन्वित प्रयास की आवश्यकता बताई. उन्होंने कहा कि केवल रासायनिक नियंत्रण से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि जैविक और समेकित प्रबंधन को भी अपनाना जरूरी है. विश्वविद्यालय लीची किसानों को हरसंभव तकनीकी सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है.
स्टिंक बग की निगरानी फरवरी-मार्च से शुरू करने की सलाह
राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर के निदेशक डॉ. विकास दास ने कहा कि लीची स्टिंक बग अब राष्ट्रीय समस्या बन चुका है. इसके प्रभावी प्रबंधन के लिए समय पर निगरानी, आवश्यकतानुसार छिड़काव और जैव-नियंत्रण एजेंटों का उपयोग जरूरी है.
उन्होंने किसानों को फरवरी-मार्च से ही कीट की निगरानी शुरू करने की सलाह दी. अंड समूहों को नष्ट करने और परजीवी कीटों के संरक्षण को भी प्रभावी उपाय बताया. उन्होंने कहा कि लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर विश्वविद्यालय के सहयोग से जिला स्तर पर जागरूकता अभियान चलाएगा, ताकि अधिक से अधिक लीची उत्पादकों तक तकनीकी जानकारी पहुंच सके.
व्यापक नियंत्रण के लिए राज्य सरकार के सहयोग की जरूरत
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहायक महानिदेशक डॉ. बी. बी. पटेल ने विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के संयुक्त प्रयास की सराहना की. उन्होंने कहा कि स्टिंक बग नियंत्रण की तकनीक विकसित की जा चुकी है और किसानों को जागरूक करने का प्रयास भी हो रहा है. हालांकि, इसके व्यापक नियंत्रण के लिए राज्य सरकार के सहयोग की भी आवश्यकता है.
वैज्ञानिकों ने स्टिंक बग के जीवन-चक्र और जैविक नियंत्रण की दी जानकारी
कार्यक्रम के तकनीकी सत्र में विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने लीची स्टिंक बग के जीवन-चक्र, पहचान और प्रबंधन के बारे में जानकारी दी. राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने जैविक नियंत्रण के उपायों पर विस्तार से चर्चा की.
कार्यक्रम के अंतिम सत्र में विभिन्न जिलों के कृषि विज्ञान केंद्रों के वैज्ञानिकों के साथ जिला-वार कार्ययोजना भी तैयार की गई. इसमें निगरानी दल का गठन, किसान पाठशाला और फील्ड प्रदर्शन जैसी गतिविधियों को शामिल किया गया.
किसानों तक पहुंचाई जाएगी प्रशिक्षण की जानकारी
स्नातकोत्तर महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. मयंक राय ने स्वागत भाषण दिया. कार्यक्रम के अंत में डॉ. सुधा नंद ने धन्यवाद ज्ञापन किया. किसानों ने प्रशिक्षण से मिली जानकारी को गांव-गांव तक पहुंचाने और लीची उत्पादकों को स्टिंक बग से बचाने में सहयोग का भरोसा दिलाया.
कार्यक्रम में अधिष्ठाता डॉ. मयंक राय, निदेशक प्रसार डॉ. आर. के. झा, निदेशक अनुसंधान डॉ. ए. के. सिंह सहित बड़ी संख्या में वैज्ञानिक, प्रगतिशील किसान और स्नातकोत्तर छात्र-छात्राएं मौजूद रहे.
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