आरएनएआर कॉलेज में विश्व शांति दिवस पर वैचारिक संगोष्ठी: प्रेम रावत का संदेश बना मुख्य आकर्षण, आंतरिक शांति पर मंथन

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संगोष्ठी में मौजूद प्रभारी प्रधानाचार्य व अन्य | Prabhat Khabar Network

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आरएनएआर कॉलेज में विश्व शांति दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में प्रेम रावत के संदेश ने आंतरिक शांति को विश्व शांति की नींव बताया. मानवीय मूल्यों पर मंथन.

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शांति संगोष्ठी महाविद्यालय: शहर के प्रतिष्ठित राम निरीक्षण आत्मा राम (आरएनएआर) महाविद्यालय में विश्व शांति दिवस के पावन अवसर पर एक विशेष और प्रेरक वैचारिक संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया. संगोष्ठी की अध्यक्षता कॉलेज के प्रभारी प्रधानाचार्य डॉ. संतोष कुमार ने की. इस वैचारिक परिचर्चा का मुख्य उद्देश्य वर्तमान समय में बढ़ती वैश्विक अशांति, तनाव और वैमनस्य के दौर में शांति, मानवीय मूल्यों, आपसी सद्भाव और सामाजिक सहिष्णुता की महत्ता पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करना था. इस मौके पर पूर्व प्रभारी प्रधानाचार्य डॉ. भोला चौरसिया की विशेष मौजूदगी ने पूरे कार्यक्रम को शैक्षणिक और बौद्धिक गरिमा प्रदान की.

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आध्यात्मिक वक्ता प्रेम रावत के वीडियो संदेश ने खींचा ध्यान

इस वैचारिक संगोष्ठी का सबसे महत्वपूर्ण आकर्षण अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रख्यात आध्यात्मिक वक्ता प्रेम रावत का एक विशेष वीडियो संदेश रहा. संदेश के माध्यम से उपस्थित सभी प्राध्यापकों, कर्मियों और विद्यार्थियों को शांति के वास्तविक अर्थ से परिचित कराया गया:

  • आंतरिक शांति ही विश्व शांति की नींव: विश्व में स्थायी शांति की स्थापना किसी बाहरी सम्मेलन या मंच से नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के अंतर्मन से शुरू होती है.
  • संतोष और ठहराव का महत्व: जब तक मनुष्य के हृदय में संतोष, आत्म-साक्षात्कार और मानसिक ठहराव का भाव विकसित नहीं होता, तब तक शांति संभव नहीं है.
  • सकारात्मक सोच का विस्तार: व्यक्ति के शांत विचार ही अंततः एक स्वस्थ समाज, सुरक्षित राष्ट्र और युद्धमुक्त विश्व के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हैं.

'संतोषं परमं सुखम्' ही वास्तविक शांति का आधार

कार्यक्रम को बतौर मुख्य वक्ता संबोधित करते हुए महाविद्यालय के पूर्व प्रभारी प्रधानाचार्य डॉ. भोला चौरसिया ने भारतीय दर्शन और सनातन जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि यदि इंसान का मन स्थिर है और उसके हृदय में तृप्ति का वास है, तो उसे शांति की खोज में कहीं बाहर भटकने की जरूरत नहीं पड़ती है.

डॉ. चौरसिया ने प्राचीन शास्त्र वाक्य "संतोषं परमं सुखम्" का उल्लेख करते हुए रेखांकित किया कि जहां संतोष है, वहीं वास्तविक सुख और परम शांति का वास होता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि एक व्यक्ति के भीतर की शांति ही सुखी परिवार, आदर्श समाज और तनावमुक्त विश्व की आधारशिला तैयार करती है.

दैनिक आचरण में मानवीय मूल्यों को ढालने का आह्वान

अध्यक्षीय संबोधन में प्रभारी प्रधानाचार्य डॉ. संतोष कुमार ने कहा कि आज की अंधी भागदौड़, भौतिकतावादी होड़ और विद्वेषपूर्ण माहौल में शांति और सद्भाव की प्रासंगिकता बहुत अधिक बढ़ गई है. उन्होंने सभी शिक्षकों व कर्मियों से अपील की कि वे अपने दैनिक व्यवहार, बातचीत और आचरण में सकारात्मकता अपनाएं, ताकि शैक्षणिक परिसर में सदैव एक शांत और प्रेरक वातावरण बना रहे.

संगोष्ठी में महाविद्यालय के शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्मियों ने भी शांति के प्रसार पर अपने विचार साझा किए. आयोजन को सफल बनाने में अंग्रेजी विभागाध्यक्ष सह मीडिया प्रभारी डॉ. सिराजुद्दीन अंसारी और मीडिया प्रभारी श्वेता अग्रवाल की भूमिका बेहद सराहनीय रही.

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