सदियों से आस्था का केंद्र है मैना गांव का मां विषहरी मंदिर

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फोटो - मां विषहरी का मंदिर | Prabhat Khabar Network

मां विषहरी का मंदिर | Prabhat Khabar Network

मैना गांव में स्थित मां भगवती विषहरी का प्राचीन मंदिर 300 वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. महाराजा हरिवल्लभ नारायण सिंह ने मंदिर का पक्का निर्माण करवाया था. जानें इस चमत्कारी मंदिर का इतिहास और महत्व.

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सहरसा : (सोनवर्षाराज) प्रखंड क्षेत्र की पड़रिया पंचायत के मैना गांव में एनएच-107 के पूर्व स्थित मां भगवती विषहरी का प्राचीन मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है. सोनवर्षाराज मुख्य बाजार से करीब पांच किलोमीटर दक्षिण स्थित इस मंदिर का इतिहास करीब 300 वर्ष पुराना बताया जाता है. स्थानीय लोगों के अनुसार यहां तीन शताब्दियों से मां विषहरी की नियमित पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है. नाग पंचमी के अवसर पर यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन एवं पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं.

महाराजा ने बनवाया था पक्का मंदिर

स्थानीय लोगों के अनुसार प्रारंभिक वर्षों में मंदिर कच्चे भवन में संचालित होता था, जहां करीब 50 वर्षों तक पूजा-अर्चना की जाती रही. बाद में सोनवर्षाराज के तत्कालीन महाराजा हरिवल्लभ नारायण सिंह ने मंदिर का पक्का भवन बनवाया. मंदिर के रख-रखाव एवं धार्मिक गतिविधियों के संचालन के लिए उन्होंने भूमि भी दान में दी थी.

हर मंगलवार को होती है विशेष पूजा

ग्रामीणों का कहना है कि महाराजा हरिवल्लभ नारायण सिंह स्वयं प्रत्येक मंगलवार को मां विषहरी की विशेष पूजा-अर्चना करने मंदिर पहुंचते थे. उसी परंपरा के कारण आज भी प्रत्येक मंगलवार को मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ उमड़ती है. दूर-दराज के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं.

2002 में हुई प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा

वर्ष 2002 में ग्रामीणों के सहयोग से मां भगवती महाविषहरी की प्रतिमा की नए मंदिर में विधि-विधान के साथ प्राण-प्रतिष्ठा की गई. पहले नाग पंचमी के अवसर पर यहां बलि प्रथा प्रचलित थी, लेकिन समय के साथ इस परंपरा को समाप्त कर दिया गया. अब श्रद्धालु वैदिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर माता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.

स्थानीय श्रद्धालुओं का मानना है कि सच्चे मन से मां विषहरी की आराधना करने पर मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. यही वजह है कि वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, जबकि नाग पंचमी के अवसर पर मंदिर परिसर में आस्था का विशाल जनसैलाब उमड़ पड़ता है.


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