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स्वतंत्रता संग्राम में नौकरी छोड़ राजेंद्र बाबू के साथ कूद पड़े थे जंग बहादुर, कई आंदोलन में थे सक्रिय

Updated at : 15 Aug 2022 5:00 AM (IST)
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स्वतंत्रता संग्राम में नौकरी छोड़ राजेंद्र बाबू के साथ कूद पड़े थे जंग बहादुर, कई आंदोलन में थे सक्रिय

पूरे देश में आजादी का 75वां अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. उन वीर सपूतों को श्रद्धांजलि दी जा रही है, जिनकी शहादत की बदौलत हम खुद को आजाद भारत का नागरिक कह कर गर्व महसूस करते हैं. नयी पीढ़ी का भी यह दायित्व है कि उन महानायकों की कुर्बानी और अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की उनकी दास्तां को जीवंत रखे.

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बात 1930 की है. नमक सत्याग्रह शुरू हो चुका था. महात्मा गांधी और राजेंद्र बाबू समेत देश के कई शीर्ष नेता इस आंदोलन को गति देने में जुटे थे. अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की लहर गांव तक भी पहुंचने लगी थी. उस वक्त भोरे प्रखंड के अमही मिश्र निवासी भी जंग बहादुर सरकारी शिक्षक थे. उनके मन में भी कुछ कुछ चल रहा था. अंग्रेजों के अत्याचार देख उनसे रहा नहीं गया, वे भी जंग-ए-आजादी में कूद पड़े. ग्रामीण बताते है कि राजेंद्र बाबू से प्रेरित होकर उन्होंने देश के लिए शिक्षक की नौकरी छोड़ दी और अमही मिश्र की धरती से ही जंग-ए-आजादी का एलान कर दिया.

नमक सत्याग्रह में थे काफी सक्रिय

राजेंद्र बाबू के साथ जंग बहादुर मिश्र नमक सत्याग्रह में काफी सक्रिय हो गये. अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को जागरूक करने लगे. अपने सहयोगियों के साथ भोरे में डाकघर को लूट लिया. अंग्रेजों के कई ठिकानों को भी उन्होंने ध्वस्त कर दिया. अंग्रेजों के खिलाफ उनकी कुशल रणनीति को देख राजेंद्र बाबू काफी प्रभावित थे. अब वे अक्सर जंग बहादुर मिश्र को आंदोलन में अपने साथ रखने लगे. डाकघर की लूट की घटना के बाद अंग्रेज अफसरों की नींद उड़ गयी थी. वे जंग बहादुर मिश्र के पीछे पड़ गये. जब वे हाथ नहीं लगे,तो 1931 में ब्रिटिश सरकार द्वारा उनके घर की कुर्की भी करा दी गयी. 1932 में वे राजेंद्र बाबू के साथ गिरफ्तार कर लिये गये.

जेल में भी जारी रहा आंदोलन

गोपालगंज एसडीओ कोर्ट से अलग-अलग मामलों में उन्हें सौ रुपये अर्थदंड तथा तीन साल की कठोर कारावास की सजा सुनायी गयी. जेल में भी वे चुप नहीं रहे. अप्रत्यक्ष रूप से जेल से भी उनका आंदोलन जारी रहा. इस वजह से अंग्रेजों द्वारा उन्हें छपरा सदर जेल, भागलपुर सदर जेल, आरा जेल तथा पटना कैंप समेत कई अलग-अलग जेलों में रखा गया. 1935 में वे जेल से बाहर आये. इसके बाद उनका आंदोलन और तेज हो गया. 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभायी. अंग्रेज फिर उन्हें गिरफ्तार करने की रणनीति बनाने लगे. लेकिन, 1935 के बाद देश आजाद होने तक वे कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं लग सके.

इंदिरा गांधी ने ताम्र पत्र देकर किया था सम्मानित

जंग बहादुर मिश्र सच्चे देशभक्त व समाज सेवक थे. देश आजाद होने तक उन्होंने अपनी लड़ाई जारी रखी. आजादी के बाद भी उन्होंने देश व समाज के लिए बहुत कुछ किया. उन्हें काफी सम्मान भी मिला. 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्र पत्र देकर उन्हें सम्मानित किया. देश व समाज के लिए उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है. आज भी कन्हैया मिश्र, ब्रजेश मिश्र समेत उनके परिवार के अन्य सदस्य जंग बहादुर मिश्र की विरासत को संभाले हुए हैं.

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