राजनीति सत्ता में हिस्सेदारी के लिए नहीं , बल्की लोकतांत्रिक परंपराओं को बचाने के लिए जानें जाते हैं जेपी

Updated at : 11 Oct 2022 5:01 AM (IST)
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राजनीति सत्ता में हिस्सेदारी के लिए नहीं , बल्की लोकतांत्रिक परंपराओं को बचाने के लिए जानें जाते हैं जेपी

Jayaprakash Narayan: 1920 में जेपी का विवाह ब्रज किशोर प्रसाद की बेटी प्रभावती से हुआ. कुछ साल बाद ही प्रभावती ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया. जेपी ने भी पत्नी के साथ ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया. जेपी ने पढ़ाई के दौरान ही अंग्रेजों के खिलाफ जंग भी छेड़ दी थी.

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पटना: 11अक्तूबर, 1902 को उत्तर प्रदेश व बिहार की सीमा पर स्थित, बलिया व सारण जिलों के बीच बंटे और अनूठी भौगोलिक सिताब दियारा गांव में जयप्रकाश नारायण का जन्म हुआ था. प्राथमिक शिक्षा गांव में हासिल करने के बाद सातवीं क्लास में उनका दाखिला पटना में कराया. बचपन से ही मेधावी जयप्रकाश को मैट्रिक की परीक्षा के बाद पटना कॉलेज के लिए स्कॉलरशिप मिली. बताया जाता है कि वह पढ़ाई के दौरान ही गांधीवादी विचारों से प्रभावित थे.

पत्नी के साथ किया ब्रह्मचर्य व्रत का पालन

1920 में जेपी का विवाह ब्रज किशोर प्रसाद की बेटी प्रभावती से हुआ. कुछ साल बाद ही प्रभावती ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया. जेपी ने भी पत्नी के साथ ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया. जेपी ने पढ़ाई के दौरान ही अंग्रेजों के खिलाफ जंग भी छेड़ दी थी.जेपी ने कॉलेज को बीच में ही छोड़ दिया. 1922 में वे कैलिफोर्निया गए और समाजशास्त्र पढ़ाई की. 1929 में अमेरिका से भारत वापस लौटे और उसी साल कांग्रेस में शामिल हो गए.

1932 में गिरफ्तार कर लिया गया

आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका निभा रहे जेपी को 1932 में गिरफ्तार कर लिया गया. जेल से बाहर आने के बाद वह भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल हुए. कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन हुआ और जेपी इसके महासचिव बनाए गए. इसके बाद 1954 में उन्होंने बिहार में बिनोवा भावे के सर्वोदल आंदोलन के लिए काम करने की घोषणा की थी. 1957 में उन्होंने राजनीति छोड़ने का भी फैसला कर लिया था. हालांकि, 1960 के दशक के अंत में एक बार फिर वे राजनीति में सक्रिय हो गए.

इंदिरा गांधी सरकार के विरोध में उठाई थी आवाज

इंदिरा गांधी और इमरजेंसी इन दोनों के नाम सुनते ही जयप्रकाश नारायण ज़ेहन में आ जाते हैं. इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल तक जयप्रकाश नारायण इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि भ्रष्टाचार, बेरोजगारी व अशिक्षा आदि की समस्याएं इस व्यवस्था की ही उपज हैं और तभी दूर हो सकती हैं, जब संपूर्ण व्यवस्था बदल दी जाये और, संपूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रांति, ‘संपूर्ण क्रांति’ आवश्यक है. उनकी संपूर्ण क्रांति में सात क्रांतियां शामिल थीं- राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति.

1975 में ‘संपूर्ण क्रांति’ का किया था आह्वान

देश की सबसे बड़ी सेवा उन्होंने 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मनमानियों के खिलाफ छात्र असंतोष के रास्ते शुरू हुए व्यापक आंदोलन का नेतृत्व करके की. इसी दौरान पांच जून, 1975 को पटना के गांधी मैदान में एक बड़ी रैली में जयप्रकाश नारायण ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का ऐतिहासिक आह्वान किया. इसके बाद 25 जून, 1975 को जेपी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में नागरिकों और सरकारी अमलों/बलों से उनके असंवैधानिक आदेशों की अवज्ञा की अपील कर दी.

कांग्रेस की केंद्र की सत्ता से पहली बेदखली

जेपी के इस आवाज के बाद सहमी श्रीमती गांधी ने देश पर इमरजेंसी थोप दी, और जेपी समेत लगभग सारे विपक्षी नेताओं को जेल में ठूसकर नागरिकों के संविधानप्रदत्त मौलिक अधिकार छीन लिये. गैरकांग्रेसवाद का सिद्धांत भले ही डॉ लोहिया ने दिया था, उसकी बिना पर कांग्रेस की केंद्र की सत्ता से पहली बेदखली 1977 में जेपी के जरिये ही संभव हुई, जब मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी.

8 अक्तूबर 1979 को ली थी अंतिम सांस

1979 में 8 अक्तूबर को पटना में अपने 77वें जन्मदिन से तीन रात पहले मधुमेह व हृदयरोग से हारकर अंतिम सांस लेनेवाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के लंबे सार्वजनिक जीवन के इतने आयाम हैं कि सभी को पन्नों पर उकेरा नहीं जा सकता है.

जेपी हमेशा रहेंगे प्रासंगिक

आजादी के पहले और आजादी के बाद भी जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने बड़ी भूमिका अदा की. चाहे वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम हो या आजाद भारत में किया गया 1974 का छात्र आंदोलन. पहले ने देश की आजादी में योगदान दिया और दूसरे आंदोलन ने तो लोकतांत्रिक परंपराओं के पुनर्स्थापन के लिए सत्ता ही पलट दी. आज 11 अक्टूबर को जेपी जयंती है. जेपी आज इसलिए प्रासंगिक हैं और हमेशा प्रासंगिक रहेंगे, क्योंकि उन्होंने सत्ता में हिस्सेदारी के लिए राजनीति नहीं की, बल्कि अपने विचारों के लिए की. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जेपी के लिए लिखते है कि जयप्रकाश वह नाम जिसे, इतिहास समादर देता है, बढ़ कर जिसके पदचिह्नों को उर पर अंकित कर लेता है. ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है…’

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