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pitrpaksh 2025: साल में सिर्फ 15 दिन गुलजार होता है ये रेलवे स्टेशन, पितृपक्ष के बाद फिर हो जाता है सुनसान

Updated at : 10 Sep 2025 11:26 AM (IST)
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साल में सिर्फ 15 दिन गुलजार होता है ये रेलवे स्टेशन

साल में सिर्फ 15 दिन गुलजार होता है ये रेलवे स्टेशन

pitrpaksh 2025: भारत में हजारों रेलवे स्टेशन हैं, लेकिन औरंगाबाद का अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन सबसे अनोखा है—क्योंकि यहां ट्रेनें साल भर नहीं, बल्कि सिर्फ 15 दिन रुकती हैं.

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pitrpaksh 2025: बिहार का औरंगाबाद जिला इन दिनों पितृपक्ष के कारण खास चर्चा में है. यहां मौजूद अनुग्रह नारायण रोड घाट रेलवे स्टेशन देश के उन चुनिंदा स्टेशनों में से है, जो साल में केवल 15 दिन यात्रियों से गुलजार रहता है. शेष 350 दिन यह स्टेशन वीरान पड़ा रहता है.

पंडित दीनदयाल उपाध्याय–गया रेलखंड पर स्थित यह स्टेशन पितृपक्ष के दौरान हजारों श्रद्धालुओं का गवाह बनता है, जो पुनपुन नदी में प्रथम पिंडदान करने यहां उतरते हैं.

पितृपक्ष में ही क्यों रुकती हैं ट्रेनें?

यह स्टेशन अनुग्रह नारायण रोड रेलवे स्टेशन से महज 1.5 किलोमीटर पहले पड़ता है. इसे अंग्रेजी हुकूमत के दौर में विशेष रूप से बनाया गया था ताकि गया जाने वाले श्रद्धालु पुनपुन नदी में प्रथम श्राद्ध कर सकें. धार्मिक मान्यता है कि गया जी में पिंडदान से पहले पुनपुन नदी में प्रथम श्राद्ध करना जरूरी है. यही वजह है कि पितृपक्ष शुरू होते ही यहां ट्रेनों का ठहराव शुरू होता है.

इस वर्ष 7 सितंबर से 21 सितंबर तक यानी पूरे 15 दिन तक ट्रेनें यहां रुकेंगी. बाकी समय स्टेशन सुनसान पड़ा रहता है.

कितनी ट्रेनें रुकती हैं?

रेलवे ने इस बार पितृपक्ष के लिए 8 जोड़ी ट्रेनों को यहां ठहरने की मंजूरी दी है. ये सभी पैसेंजर ट्रेनें हैं, जो पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन (मुगलसराय) से चलकर गया तक जाती हैं. श्रद्धालु इसी बीच अनुग्रह नारायण रोड घाट स्टेशन पर उतरते हैं, पिंडदान करते हैं और फिर गया की ओर रवाना हो जाते हैं.

टिकट काउंटर नहीं, फिर कैसे करते हैं सफर?

स्टेशन पर कोई टिकट काउंटर नहीं है. श्रद्धालु गया स्टेशन तक का टिकट लेते हैं और उसी टिकट पर यहां उतर जाते हैं. पुनपुन नदी में पिंडदान करने के बाद वे या तो अनुग्रह नारायण रोड मुख्य स्टेशन से ट्रेन पकड़ते हैं या गया तक का सफर जारी रखते हैं.

स्टेशन की जर्जर हालत

क्योंकि यहां साल में सिर्फ 15 दिन ट्रेनें रुकती हैं, बाकी दिनों स्टेशन वीरान रहता है. इसकी वजह से स्टेशन की हालत लगातार बिगड़ती गई है. श्रद्धालु अक्सर यहां की बदइंतजामी देखकर निराश हो जाते हैं. हालांकि इस बार रेलवे ने कुछ इंतजाम किए हैं—

हाई मास्क लाइट लगाई गई है, रेलवे पुलिस बल की तैनाती हुई है, पीने के पानी की व्यवस्था की गई है.

विष्णु धाम परिसर में बेहतर व्यवस्था

स्टेशन की व्यवस्था भले कमजोर हो, लेकिन श्रद्धालुओं को ज्यादा दिक्कत नहीं होती. स्टेशन से लगभग एक किलोमीटर दूर विष्णु धाम मंदिर परिसर और पुनपुन नदी घाट पर बेहतर प्रबंध किए जाते हैं.

पक्के घाट, ठहरने की व्यवस्था, वाहन पार्किंग और सुरक्षा बल की मौजूदगी, यहां आने वाले श्रद्धालु विष्णु धाम परिसर की व्यवस्थाओं से संतुष्ट नजर आते हैं. विभा श्रीवास्तव नामक श्रद्धालु ने कहा, “स्टेशन पर तो उतनी अच्छी व्यवस्था नहीं है, लेकिन विष्णु धाम में बढ़िया प्रबंध है. रहने और पार्किंग की पूरी सुविधा है.”

सवाल उठाती तस्वीर

रेलवे ने इस बार सुरक्षा और सुविधा की दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन यह सवाल अब भी कायम है—क्या साल में सिर्फ 15 दिन चलने वाले इस स्टेशन को स्थायी रूप से विकसित किया जाएगा, या यह यूं ही परंपरा के सहारे चलता रहेगा?

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Pratyush Prashant

लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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