जहां शाम के बाद जंगल में जाने से डरते थे लोग, अब रात में गूंजती है आरती, जुटते हैं श्रद्धालु, ऐसे बदला 400 साल पुराने मंदिर का रिवाज

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बिहटा वन देवी मंदिर

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Bihta Van Devi Temple : बिहटा के 400 साल पुराने मां वन देवी मंदिर का इतिहास बदला है. कभी शाम के बाद जंगल जाने से लोग डरते थे, अब रात में आरती और भजन होते हैं. जानें पूरी कहानी.

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Bihta Van Devi Temple : पटना जिले के बिहटा प्रखंड में रेलवे स्टेशन से करीब चार किलोमीटर दक्षिण अमहारा और खगरपुर-कंचनपुर के बीच स्थित मां वन देवी मंदिर वर्षों से स्थानीय आस्था और लोकविश्वास का केंद्र रहा है. स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर करीब 400 साल पुराना है. आज मंदिर के आसपास आबादी, सड़क, बिजली और दुकानें हैं, लेकिन बुजुर्गों के मुताबिक कभी यहां घना जंगल हुआ करता था.

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1995 तक शाम के बाद जंगल की ओर जाने से बचते थे लोग

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार करीब 1995 तक सूर्यास्त के बाद मंदिर के आसपास के जंगल की ओर जाने से लोग परहेज करते थे. उस समय इलाके में आबादी कम थी और बिजली तथा आवागमन की सुविधाएं भी आज जैसी नहीं थीं. अंधेरा होते ही आसपास सन्नाटा छा जाता था और लोग अपने घर लौट जाते थे.

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अब रात में गूंजती है आरती और भजन

समय के साथ वन देवी मंदिर और उसके आसपास का इलाका पूरी तरह बदल गया. बिजली पहुंची, सड़क और आवागमन बेहतर हुआ तथा मंदिर के आसपास दुकानें खुलीं. अब रात में भी श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती है. मंदिर परिसर में आरती, भजन और जागरण का आयोजन होता है. परंपरा के अनुसार आरती के बाद माता का पट बंद कर दिया जाता है, जबकि इसके बाद भी आसपास धार्मिक कार्यक्रम चलते रहते हैं.

मंदिर में पूजा करते श्रद्धालु
मंदिर में पूजा करते श्रद्धालु

विंध्याचल माता के अंश से जुड़ी है मान्यता

मंदिर के मुख्य पुजारी हरिओम मिश्र और स्थानीय श्रद्धालुओं के अनुसार मां वन देवी को विंध्याचल माता का अंश माना जाता है. यहां देवी की पूजा पिंड स्वरूप में होती है. स्थानीय मान्यता के अनुसार मंदिर में लंबे समय से वैदिक और तांत्रिक विधि से पूजा होती आ रही है. श्रद्धालु मनोकामना पूरी होने के बाद यहां पहुंचकर मन्नत उतारने की परंपरा भी बताते हैं.

विद्यानंद बाबा से जुड़ी है मंदिर की स्थापना की जनश्रुति

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार करीब चार सौ वर्ष पहले मिश्रीचक राघोपुर निवासी पंडित श्याम जी के पुत्र विद्यानंद बाबा मां विंध्याचल के उपासक थे. जनश्रुति है कि अस्वस्थ होने के कारण जब उनके लिए विंध्याचल जाना मुश्किल हुआ, तो उन्होंने देवी से अपने पास आने की प्रार्थना की.

दर्शन के लिए लाइन में खड़े श्रद्धालु
दर्शन के लिए लाइन में खड़े श्रद्धालु

स्वप्न में देवी की आज्ञा मिलने की कही जाती है बात

स्थानीय कथा के अनुसार उसी रात विद्यानंद बाबा को स्वप्न में देवी की आज्ञा मिली कि वे देवी के पिंड का एक अंश लेकर अपने घर के समीप स्थापित करें. इसके बाद पिंड का एक अंश मिश्रीचक-अमहारा मौजा के जंगल में स्थापित किए जाने की बात कही जाती है. स्थानीय लोगों के अनुसार यहीं से मां वन देवी की पूजा की परंपरा शुरू हुई.

लंबे समय तक खुले स्थान पर होती रही पूजा

स्थानीय लोगों के मुताबिक कई वर्षों तक यहां कोई पक्का मंदिर नहीं था. जंगल के बीच खुले स्थान पर ही देवी की पूजा-अर्चना होती थी. लोकविश्वास था कि वन देवी जंगल में ही रहना पसंद करती हैं और पक्का मंदिर बनाने से माता नाराज हो सकती हैं. इसी मान्यता के कारण लंबे समय तक मंदिर निर्माण नहीं कराया गया.

1959 में यज्ञ के बाद बना ईंट का मंदिर

स्थानीय जानकारी के अनुसार वर्ष 1959 में भगवान दास त्यागी नामक महात्मा ने ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर यहां यज्ञ कराया था. यज्ञ समाप्त होने के बाद उनके द्वारा यहां ईंट का छोटा मंदिर बनाए जाने की बात कही जाती है. इसके बाद धीरे-धीरे मंदिर के विकास का सिलसिला शुरू हुआ.

1997 में बनी कमेटी, फिर बदला मंदिर का स्वरूप

स्थानीय लोगों के अनुसार 12 फरवरी 1997 को मंदिर के विकास के लिए 11 सदस्यों की कमेटी बनाई गई. इसमें अंगिरा शर्मा, दीपु कुमार, सहजानंद शर्मा, अजय कुमार और सुरेंद्र ठाकुर समेत अन्य लोग शामिल थे. कमेटी और स्थानीय लोगों ने चंदा जुटाकर मंदिर का निर्माण कराया. इसके बाद मंदिर का स्वरूप धीरे-धीरे भव्य होता गया.

रविवार और मंगलवार को जुटती है विशेष भीड़

मंदिर में प्रत्येक रविवार और मंगलवार को श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ जुटती है. नवरात्र के दौरान यहां विशेष तैयारी की जाती है. शारदीय और चैती नवरात्र में दूर-दराज से भी श्रद्धालु दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं. पूर्णिमा, दीपावली चतुर्दशी, फाल्गुन पूर्णिमा और वसंत पंचमी पर विशेष पूजा की परंपरा भी स्थानीय लोग बताते हैं.

त्रयोदशी की रात जागरण और भंडारे की परंपरा

स्थानीय जानकारी के अनुसार त्रयोदशी की रात मंदिर में जागरण और भंडारे का आयोजन भी वर्षों से होता आ रहा है. नवरात्र के दिनों में मंदिर परिसर और आसपास के इलाके में विशेष चहल-पहल रहती है. पूजा सामग्री की दुकानों पर भी श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है.

जंगल की जगह अब आबादी और बाजार ने ले ली

कभी जिस इलाके में शाम के बाद सन्नाटा छा जाता था, वहां अब आबादी बढ़ चुकी है. मंदिर के आसपास पूजा सामग्री की दुकानें खुल गई हैं. श्रद्धालु नारियल, चुनरी और अन्य पूजन सामग्री खरीदकर माता के दर्शन करते हैं. बिजली और बेहतर आवागमन ने भी रात में लोगों की आवाजाही को आसान बनाया है.

वन देवी की लोककथा पहुंची बड़े पर्दे तक

बिहटा के वन देवी मंदिर से जुड़ी लोककथा अब बॉलीवुड तक पहुंच गई है. सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फिल्म ‘द व्वान: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ को इस मंदिर और उससे जुड़ी लोकमान्यताओं से प्रेरित बताया जा रहा है. फिल्म 25 सितंबर 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है.

मंदिर का गर्भगृह
मंदिर का गर्भगृह

फिल्म में दिखेगी जंगल, आस्था और लोकविश्वास की कहानी

फिल्म के ट्रेलर में रहस्यमयी जंगल, वन देवी से जुड़ी मान्यताओं और विकास के लिए जंगल में पेड़ काटने के बीच टकराव की कहानी दिखाई गई है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार फिल्म की कहानी के लिए बिहटा के वन देवी मंदिर से जुड़ी लोककथाओं से प्रेरणा ली गई है. हालांकि मंदिर से जुड़ी अलौकिक मान्यताएं स्थानीय लोकविश्वास का हिस्सा हैं, उनके पीछे किसी अलौकिक घटना का स्वतंत्र प्रमाण नहीं है.

फिल्म से क्षेत्र के लोगों में उत्साह

वन देवी के भक्त और समाजसेवी रिंकू सिंह ने कहा कि मंदिर की महिमा वर्षों से बिहटा के लोगों की आस्था से जुड़ी है. अब इससे जुड़ी लोककथा बड़े पर्दे तक पहुंच रही है, जिससे क्षेत्र के लोगों में उत्साह है.

अमहारा के वार्ड पार्षद सन्नी सिंह ने कहा कि वन देवी मंदिर से लोगों की गहरी आस्था जुड़ी है. फिल्म के माध्यम से बिहार की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को व्यापक स्तर पर जानने का अवसर मिलेगा.

वार्ड पार्षद संजेश कुमार ने कहा कि मंदिर से जुड़ी लोककथा लंबे समय से स्थानीय लोगों के बीच सुनाई जाती रही है. फिल्म के माध्यम से इस कथा को बिहार से बाहर के लोग भी जान सकेंगे.

भजन गायक रिंकू पाठक ने कहा कि वन देवी के प्रति लोगों की आस्था काफी पुरानी है. मंदिर से जुड़ी लोककथाओं में धार्मिक भावना के साथ रहस्य का भी भाव है.

बिहटा राघोपुर निवासी आचार्य धनंजय मिश्रा ने कहा कि वन देवी की महिमा और मंदिर की मान्यताएं वर्षों से श्रद्धालुओं के बीच सुनाई जाती रही हैं. अब इससे जुड़ी लोककथा फिल्म के माध्यम से व्यापक स्तर पर पहुंच रही है.

क्या कहते हैं मुख्य पुजारी

मंदिर के मुख्य पुजारी हरिओम मिश्र ने बताया कि मां वन देवी के प्रति लोगों की आस्था वर्षों पुरानी है. बुजुर्गों से सुनते आए हैं कि पहले मंदिर के चारों ओर घना जंगल था और शाम ढलने के बाद लोग इधर आने से परहेज करते थे. उस समय बिजली और आवागमन की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी.

उन्होंने बताया कि अब समय बदल गया है. मंदिर के आसपास आबादी बढ़ी है, बिजली और सड़क की सुविधा हुई है तथा पूजा सामग्री की दुकानें भी खुली हैं. अब रात में भी श्रद्धालुओं का आना-जाना रहता है और आरती, भजन व जागरण का आयोजन होता है. हालांकि आरती के बाद माता का पट बंद कर दिया जाता है. बदलते समय के बावजूद मां वन देवी के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास कायम है.

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