आयुर्वेदिक चिकित्सा के विकास में बिहार की रही है अहम भूमिका : फागू चौहान
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :26 Dec 2019 8:38 AM (IST)
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पटना : आयुर्वेद के क्षेत्र में बिहार का गौरवमय इतिहास रहा है. बुधवार को राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज व अस्पताल में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार को संबोधित करते हुए राज्यपाल फागू चौहान ने आगे कहा कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का प्रारंभ ही आयुर्वेद संकाय से हुआ था. नालंदा विश्वविद्यालय के पहले कुलपति रसशास्त्र के उदभट्ट विद्वान नार्गाजुन […]
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पटना : आयुर्वेद के क्षेत्र में बिहार का गौरवमय इतिहास रहा है. बुधवार को राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज व अस्पताल में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार को संबोधित करते हुए राज्यपाल फागू चौहान ने आगे कहा कि प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का प्रारंभ ही आयुर्वेद संकाय से हुआ था.
नालंदा विश्वविद्यालय के पहले कुलपति रसशास्त्र के उदभट्ट विद्वान नार्गाजुन हुए थे, जिनके कार्यकाल में रस-औषधियों का विकास व्यापक स्तर पर हुआ था. प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय में सोना जैसे खनिज पदार्थों से दवाइयां बनाकर स्वस्थ एवं दीर्घायु जीवन के लिए शोध एवं अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था की गयी थी.
नालंदा में पूरी दुनिया से लोग ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते थे. च्यवन ऋषि की जन्मभूमि एवं कर्मस्थली भी बिहार की ही भूमि थी, जिन्होंने औषध-निर्माण के क्षेत्र में एक कीर्तिमान स्थापित किया था. उनके द्वारा निर्मित ‘च्यवनप्राश’ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इस्तेमाल होता है.
आयुर्वेदिक-चिकित्सा पद्धति हमारी भारतीय वैदिक संस्कृति से जुड़ी हुई है. राज्यपाल ने कहा कि आयुर्वेद के अध्ययन के लिए संस्कृत भाषा का अध्ययन जरूरी है. संस्कृत हमारे ज्ञान – विज्ञान की एक अत्यंत समृद्ध भाषा है, जो आज के कंप्यूटर युग में तकनीकी तौर पर भी अत्यंत विकसित पायी गयी है. राजभवन भी आयुर्वेद-चिकित्सा को प्रोत्साहित करने हेतु पूर्ण तत्पर है.
राजभवन परिसर में ‘धन्वन्तरि वाटिका’ की स्थापना की गयी है, उद्घाटन समारोह में कॉलेज के प्राचार्य प्रो दिनेश्वर प्रसाद ने कॉलेज में हो रहे विकास व शोध कार्यों की जानकारी दी. आयोजन सचिव डॉ सुमेश्वर सिंह, सत्तारूढ़ दल के मुख्य सचेतक अरुण कुमार सिन्हा, स्वास्थ्य विभाग के कार्यपालक निदेशक अरविंद सिंह आदि ने भी अपने विचार रखें. इस सत्र का संचालन प्रभात द्विवेदी ने किया.
ज्यादा बेहतर हैं पारंपरिक तरीके से बनीं दवाएं
सेमिनार में राजकीय आयुर्वेदिक कॉलेज, पटना के डॉ गणेश प्रसाद ने कहा कि आयुर्वेद के रसशास्त्र में वर्णित भस्मों आदि का पारंपरिक तरीके व सिद्धांत से शुद्धीकरण करना आज भी बेहतर है. इसका शरीर पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता. वहीं भस्म बनाने वाली ब्रांडेड दवा कंपनियों के प्रोडक्ट में कई खामियां पायी गयी हैं.
इन्हें अच्छी तरह से शुद्ध कर खाने लायक बनाने की जरूरत है. जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेदिक संस्थान से आये डॉ संजय कुमार ने रसाऔषद्धियों के भस्म की परीक्षा आधुनिक परिपेक्ष्य में कैसे करें, इसकी जानकारी दी. उन्होंने कहा कि प्राचीन शास्त्रों में इनकी परीक्षा की तकनीक बतायी गयी है जिसके द्वारा हम जान सकते हैं कि भस्म उत्तम है कि नहीं.
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