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पटना की ऋचा ने की सरकार से मांग, ट्रेन में भी उपलब्ध हो सेनेटरी पैड, कहा- पीरियड्स बोल कर नहीं आती

Updated at : 21 Jan 2018 3:55 PM (IST)
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पटना की ऋचा ने की सरकार से मांग, ट्रेन में भी उपलब्ध हो सेनेटरी पैड, कहा- पीरियड्स बोल कर नहीं आती

सहरसा / पटना : पटना में आर्ट गैलरी व विभिन्न माध्यमों के जरिये नारी सशक्तीकरण पर काम कर रही ऋचा ने सरकार से मांग की है कि महिला यात्रियों को ट्रेन में सेनेटरी पैड उपलब्ध करायी जाये. पटना के एएन कॉलेज से पीजी कर चुकी ऋचा की मांग को सोशल साइट फेसबुक और ट्विटर पर […]

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सहरसा / पटना : पटना में आर्ट गैलरी व विभिन्न माध्यमों के जरिये नारी सशक्तीकरण पर काम कर रही ऋचा ने सरकार से मांग की है कि महिला यात्रियों को ट्रेन में सेनेटरी पैड उपलब्ध करायी जाये. पटना के एएन कॉलेज से पीजी कर चुकी ऋचा की मांग को सोशल साइट फेसबुक और ट्विटर पर पर काफी सराहा जा रहा है. ऋचा ने बताया कि यह बात लोगों को समझनी चाहिए कि पीरियड्स बोल कर नहीं आती. ऐसे में चलती ट्रेन में मासिक धर्म के दौरान महिला की स्थिति काफी खराब हो जाती है. अब महानगरों में बदलाव देखा जा रहा है. पहले लोग इन चीजों का नाम लेने में भी हिचकिचाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब लोग पीरियड्स-माहवारी, सेनेटरी नैपकिन-स्वच्छता आदि विषयों पर खुल कर अपनी बात रख रहे हैं. इसके बावजूद कोसी इलाके में सेनेटरी नैपकिन 80 फीसदी महिलाओं की पहुंच से दूर है.

सहरसा जिले के सहशौल निवासी दंपती राकेश सिंह व नूतन सिंह की 26 वर्षीया बेटी ऋचा सिंह ने देश और समाज को इन चीजों से रूबरू कराने का बीड़ा उठाया है. ऋचा बताती हैं कि स्टेशन पर सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध रहता है. लेकिन, पीरियड्स स्टेशन पर ट्रेन रुकने के बाद आये, ऐसा संभव नहीं है. इसलिए रेल मंत्रालय ट्रेन में पैड उपलब्ध कराने की व्यवस्था करे. सेनेटरी नैपकिन अभियान के बाबत ऋचा बताती हैं कि वे लोगों से सिर्फ एक पैड डोनेट करने की अपील कर रही हैं, ताकि उसे जरूरतमंद महिलाओं तक पहुंचा कर उन्हें जागरूक किया जा सके. शहर में भी अभिभावक अपने बच्चों से इस प्रकार के मुद्दे पर बात करने की इजाजत नहीं देते हैं, जो समाज के लिए चिंतनीय है. उन्होंने बताया कि ट्रेन से शुरू किये गये इस अभियान को जन-जन तक पहुंचाने का लक्ष्य है.

कोसी क्षेत्र की 80 फीसदी महिलाएं अब भी अनभिज्ञ

ऋचा बताती हैं कि कोसी क्षेत्र में अब भी कई ऐसे इलाके हैं, जहां माहवारी अभी शर्म और झिझक का मुद्दा है. कोसी इलाके में सेनेटरी नैपकिन 80 फीसदी महिलाओं की पहुंच से दूर है. ग्रामीण इलाकों में ‍‍लोग माहवारी के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं. कुछ महिलाएं तो घास-फूस और राख तक का इस्तेमाल करती हैं. सेनेटरी नैपकिन का तो उन्होंने नाम तक नहीं सुना है. ऐसे में ऋचा ने सेनेटरी नैपकिन डोनेशन अभियान की शुरुआत की है. नैपकिन के इस्तेमाल के लिए महिलाओं की काउंसलिंग प्रोग्राम भी चला रही हैं. वे शहर से लेकर गांव तक पहुंच महिलाओं को इसके फायदे भी बता रही हैं. इसके तहत लोगों को बता रही है कि पीरियड्स के दौरान नैपकिन का प्रयोग नहीं करने पर कई प्रकार के संक्रमण का खतरा महिलाओं को रहता है. ऋचा बताती है कि अभियान के दौरान कई गंभीर सवाल भी सामने आते है, जब महिलाएं पूछती हैं कि आखिर नैपकिन दिखता कैसा है. इसको लगाने से कोई हानि तो नहीं होगी. इसके अलावा कई सवाल सामने आते हैं. उन्होंने बताया कि अभियान को घर-घर तक पहुंचाने के लिए सभी को आगे आने की आवश्यकता है.

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