‘झंडू कुमार’ को कभी नाम पर मिले ताने, मेडल जीते तो हुआ भव्य स्वागत, पीएम मोदी की भी मिली बधाई
पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार और पीएम मोदी से मुलाकात की तस्वीर.
Jhandu Kumar Success Story: नालंदा के झंडू कुमार ने ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में पैरा पावरलिफ्टिंग में कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है. पांच साल की उम्र में पोलियो का शिकार होने के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी और ई-रिक्शा चलाकर व सब्जी बेचकर अपने माता-पिता की मदद की.
Jhandu Kumar Success Story: नालंदा के हरनौत की मिट्टी से निकले पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में कांस्य पदक जीतकर न सिर्फ बिहार, बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया है. पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में झंडू कुमार ने 190 किलोग्राम का सर्वश्रेष्ठ सफल भार उठाकर कांस्य पदक अपने नाम किया और कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत को पहला पदक दिलाया.
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पदक जीतने के बाद पहली बार अपने पैतृक क्षेत्र नालंदा के हरनौत पहुंचने पर झंडू कुमार का मंगलवार को ऐतिहासिक और भव्य स्वागत किया गया. स्थानीय लोगों ने उन्हें रथ पर बैठाकर नगर क्षेत्र में विजय जुलूस निकाला. जगह-जगह लोगों ने फूल-मालाओं से उनका स्वागत किया. बड़ी संख्या में खेलप्रेमी, जनप्रतिनिधि और आम लोग उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़े.
रथ पर निकला विजय जुलूस, हरनौत में दिखा गजब का उत्साह
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का झंडा बुलंद करने वाले झंडू कुमार जब अपने घर पहुंचे तो हरनौत में जश्न का माहौल बन गया. लोगों ने उन्हें रथ पर बैठाया और पूरे नगर क्षेत्र में भ्रमण कराया.
चंडी रोड स्थित एक निजी जिम के समीप नागरिक अभिनंदन समारोह का आयोजन किया गया, जहां बड़ी संख्या में लोग जुटे. समारोह में झंडू कुमार को अंगवस्त्र और पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया गया. पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए उन्हें फलदार पौधा भी भेंट किया गया.
स्थानीय लोगों का कहना था कि झंडू की उपलब्धि सिर्फ एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि पूरे नालंदा और बिहार के लिए गौरव का विषय है.

पांच साल की उम्र में पोलियो ने बदली जिंदगी
झंडू कुमार की कहानी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. बचपन में पोलियो की वजह से उन्हें शारीरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा. इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और खेल को अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना लिया.
नालंदा के हरनौत से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का उनका सफर आर्थिक कठिनाइयों से भरा रहा. परिवार की आर्थिक स्थिति सामान्य नहीं थी और जीविका के लिए परिवार को सब्जी बेचने का काम करना पड़ा.
कठिन परिस्थितियों के बावजूद झंडू ने अपने खेल को जारी रखा और धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बनाई.

माता-पिता ने सब्जी बेचकर चलाया परिवार
झंडू कुमार के संघर्ष में उनके माता-पिता की भूमिका बेहद अहम रही है. परिवार लंबे समय से हरनौत में सब्जी बेचकर अपनी आजीविका चलाता रहा है. आर्थिक मुश्किलों के बीच परिवार ने झंडू के इलाज और खेल से जुड़े खर्चों को पूरा करने की कोशिश की.
झंडू ने भी परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए काम किया. प्रशिक्षण और डाइट का खर्च जुटाने के लिए उन्होंने करीब आठ-नौ महीने तक ई-रिक्शा चलाया. दिनभर काम करने के बाद वह अभ्यास के लिए जिम पहुंचते थे.
यानी जिस खिलाड़ी ने आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर 190 किलो वजन उठाया है, उसने अपनी जिंदगी में परिवार का बोझ भी उठाया और अपने सपनों का भार भी.
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190 किलो उठाकर भारत को दिलाया पहला पदक
ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में झंडू कुमार ने पुरुषों की हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन किया. उन्होंने पहले प्रयास में 181 किलो वजन सफलतापूर्वक उठाया और इसके बाद दूसरे प्रयास में 190 किलो वजन उठाकर अपना स्कोर बेहतर किया. वह तीसरे प्रयास में 196 किलो उठाने में सफल नहीं हो सके.
190 किलो के सर्वश्रेष्ठ सफल प्रयास के साथ झंडू कुमार ने कांस्य पदक जीता और प्रतियोगिता में भारत का पदक खाता खोला.
उनका प्रदर्शन इसलिए भी खास रहा क्योंकि वह कुछ समय तक पदक तालिका में शीर्ष स्थिति पर बने हुए थे. तीसरे प्रयास में वह 196 किलो का भार नहीं उठा सके और अंततः कांस्य पदक के साथ प्रतियोगिता समाप्त की.
सोना चूकने का मलाल, लेकिन लक्ष्य अभी बड़ा
झंडू कुमार ने प्रतियोगिता के बाद संकेत दिया कि उन्हें स्वर्ण पदक का मौका गंवाने का अफसोस जरूर है, लेकिन वह इससे निराश नहीं हैं. उनकी नजर अब आने वाली बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं पर है.
रिपोर्टों के मुताबिक झंडू ने आगे पैरा एशियन गेम्स और पैरालंपिक के लिए तैयारी जारी रखने की बात कही है. उन्होंने 232 किलोग्राम के रिकॉर्ड को तोड़ने का लक्ष्य भी बताया है.
पीएम मोदी ने दी बधाई, अगस्त में हुई मुलाकात
झंडू कुमार के ऐतिहासिक प्रदर्शन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें सोशल मीडिया के जरिए बधाई दी थी. प्रधानमंत्री ने उनके प्रदर्शन, दृढ़ संकल्प और मेहनत की सराहना की थी.
इसके बाद अगस्त 2026 में झंडू कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शिष्टाचार मुलाकात भी की. नालंदा से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार यह मुलाकात उनके लिए बेहद खास रही.
खास बात यह है कि केंद्रीय खेल मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी में झंडू ने प्रधानमंत्री की ओर से सोशल मीडिया पर मिली बधाई को लेकर अपनी खुशी व्यक्त की थी. उन्होंने कहा था कि प्रधानमंत्री से मिली सराहना उनके लिए बेहद उत्साह बढ़ाने वाली रही.
खेल मंत्री ने 10 लाख रुपये से किया सम्मानित
कांस्य पदक जीतने के बाद केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने भी झंडू कुमार को सम्मानित किया. 27 जुलाई 2026 को आयोजित समारोह में मंत्री ने उन्हें 10 लाख रुपये का नकद पुरस्कार दिया.
केंद्रीय खेल मंत्रालय के अनुसार, मांडविया ने झंडू की उपलब्धि की सराहना की और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की. झंडू ने भी खेल मंत्री से सम्मान प्राप्त करने को अपने लिए गौरव का क्षण बताया.
खेल मंत्री ने झंडू को आगे भी शानदार प्रदर्शन जारी रखने और आने वाली अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए बेहतर पदक जीतने के लिए प्रेरित किया.
कभी नाम को लेकर ताने मिले, अब उसी नाम की गूंज अंतरराष्ट्रीय मंच पर
झंडू कुमार की कहानी का एक भावनात्मक पहलू उनके नाम से भी जुड़ा है. बचपन में उनके नाम को लेकर उन्हें ताने और मजाक का सामना करना पड़ा. लेकिन जिस नाम को कभी उपहास का कारण बनाया जाता था, वही नाम आज कॉमनवेल्थ गेम्स के पदक विजेता के रूप में अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान बन चुका है.
झंडू ने इन परिस्थितियों को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उन्होंने अपनी मेहनत को जवाब बनाया और आखिरकार कॉमनवेल्थ पदक तक पहुंच गए.
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हरनौत के युवाओं के लिए बने प्रेरणा
हरनौत में हुए स्वागत समारोह के दौरान वक्ताओं ने झंडू कुमार की सफलता को युवाओं के लिए प्रेरणादायक बताया. लोगों ने कहा कि सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद झंडू ने जिस तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन किया है, वह आने वाली पीढ़ी को मेहनत करने की प्रेरणा देगा.
झंडू की सफलता यह भी बताती है कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों या महंगे प्रशिक्षण केंद्रों तक सीमित नहीं है. सही मार्गदर्शन, परिवार का सहयोग और मजबूत इच्छाशक्ति हो तो छोटे शहर और साधारण परिवार से निकला खिलाड़ी भी दुनिया के बड़े मंच पर देश का झंडा लहरा सकता है.
झंडू बोले- यह तो शुरुआत है
कांस्य पदक जीतने के बाद झंडू कुमार का लक्ष्य अब और बड़ा हो गया है. उनका कहना है कि यह उपलब्धि उनके सफर का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत है.
कॉमनवेल्थ में कांस्य पदक जीतने के बाद अब उनकी नजर आने वाली बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं पर है. वह भारत के लिए और पदक जीतना चाहते हैं और अपने प्रदर्शन को लगातार बेहतर करने की तैयारी कर रहे हैं.
हरनौत के एक साधारण परिवार से निकलकर ग्लासगो में भारत का पहला पदक जीतने तक झंडू कुमार ने जिस तरह संघर्ष किया, वह आज पूरे बिहार के लिए गर्व और प्रेरणा की कहानी बन चुका है.
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