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बोले लीची किसान, इस बार दो हजार करोड़ का नुकसान

मुजफ्फरपुर: फल बेधक कीट व फंगस के कारण उत्तर बिहार में 28 हजार हेक्टेयर जमीन की लीची बरबाद हो गई है. इससे किसानों को दो हजार करोड़ रुपये की क्षति हुई है. केवल इस जिले में दस हजार हेक्टेयर में लीची बरबाद है. ऊपर से केंद्र व राज्य सरकार का रवैया किसानों के जख्म पर […]

मुजफ्फरपुर: फल बेधक कीट व फंगस के कारण उत्तर बिहार में 28 हजार हेक्टेयर जमीन की लीची बरबाद हो गई है. इससे किसानों को दो हजार करोड़ रुपये की क्षति हुई है. केवल इस जिले में दस हजार हेक्टेयर में लीची बरबाद है. ऊपर से केंद्र व राज्य सरकार का रवैया किसानों के जख्म पर नमक डाल रहा है. राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र के बागों के फल में जब पिल्लू हो गया तो किसानों की बात मत पूछिए. लीची किसानों, लीची व्यापारियों व लीची प्रोसेसिंग कारोबार से जुड़े लोगों के समक्ष आत्महत्या ही रास्ता बचा है. किसान सारे लीची कटवा मॉल बनवा देंगे. दूसरी फैक्टरी लगवा देंगे. यह बातें किसान नेता व लीची उत्पादक भोला नाथ झा ने जुब्बा सहनी पार्क स्थित द पार्क होटल में कही. श्री झा लीची किसान, व्यापारी व प्रोसेसिंग से जुड़े कारोबारियों की बैठक को संबोधित कर रहे थे.
श्री झा ने कहा, लीची की बरबादी का सबसे बड़ा साबूत है कि इस साल शाही लीची राष्ट्रपति को नहीं भेजी जा सकी. ऊपर से केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह बोल रहे हैं कि यहां की लीची बरबाद कैसे हो गई? मेहसी की लीची तो बरबाद नहीं हुई है. इन नेताओं से किसानों का भरोसा उठ गया है. केंद्रीय कृषि मंत्री ने लीची का हाल देखने के लिए कोई केंद्रीय सव्रेक्षण दल भेजने के बजाय उलटा सीधा बयान दे दिया.
लिची सिटी की पहचान हो रही गायब
लीची का इंटरनेशनल के केपी ठाकुर बताते हैं कि राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र यहां के लिए काम नहीं कर रहा है. लीची सिटी के रू प में चर्चित इस शहर की पहचान गायब हो रही है. पश्चिम बंगाल, केरल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गोरखपुर, पूवरेत्तर भारत में लीची की खेती बढ़ रही है. लीची में इस वर्ष लीची की मिठास मात्र 13 प्रतिशत ही हुआ. कांटी के लीची व्यापारी भोला त्रिपाठी व लखनऊ के जय प्रकाश वाजपेयी बताते हैं कि उन दोनों ने सम्मिलित कारोबार में किसानों के बीच दो करोड़ रुपये बांट दिया. लीची का सीजन समाप्त है. अभी तक मात्र 60 लाख रुपये ही रिटर्न हुए हैं. किसान व्यापारियों की बात सुनने को तैयार नहीं है. दोनों में संबंध खराब हो रहा है. जो पैसा एडवांस कर दिया, किसान उसे लौटा नहीं रहे हैं. जबकि व्यापारी के पैसे से बागों की देख रेख होती है. इतना नुकसान सहने से बेहतर है कोई दूसरा कारोबार करें.
प्रमुख लीची उत्पादक प्रेम कुमार सिंह, शंभु चौबे, कैलाश प्रसाद सिंह बताते हैं कि फल बेधक कीट फल से गिर कर जमीन में टहल रहा है. अब आगे कई गुना बढ़ सकता है. लीची का मंजर तोड़ना जरू री है. ऐसा नहीं होने पर अगले वर्ष के लिए फलन नहीं होगा. पेड़ पर चढ़ते ही लीची गिर जाती है. दो सौ से तीन सौ रुपये एक पेटी लीची तोड़ने में खर्च है. ऐसे में पेड़ कटवा देना ही एक रास्ता बचा हुआ है. यहां लीची नहीं रहेगी, कृषि मंत्रलय व अनुसंधान केंद्र रहेगा, लीची समाप्त हो जायेगी.
Prabhat Khabar Digital Desk
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