महामारी से मुक्ति और तांत्रिक बामाखेपा की साधना से जुड़ी है जमालपुर के इस सिद्धपीठ की कहानी

Published by : Pratyush Prashant Updated At : 15 Jun 2026 7:23 AM

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बारोबारी तल्ला दुर्गा स्थान

Aaj Ka Darshan: "जब महामारी से त्रस्त था जमालपुर, तब एक तांत्रिक ने बदल दी थी पूजा की परंपरा! 200 साल पुराने इस मंदिर से जुड़ी है अनोखी कहानी"

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मुंगेर के जमालपुर से विजय कुमार गुप्ता की रिपोर्ट.

Aaj Ka Darshan: रेल नगरी जमालपुर के बड़ी दरियापुर स्थित बारोबारी तल्ला दुर्गा स्थान परिसर सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और लोकविश्वास का ऐसा केंद्र है जिसकी कहानी करीब दो शताब्दियों पुरानी बताई जाती है. यहां स्थापित मां दक्षिणेश्वरी काली की प्रतिमा के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है. सुबह-शाम होने वाली पूजा-अर्चना में बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं. लेकिन इस मंदिर की सबसे बड़ी पहचान उस घटना से जुड़ी है, जब एक महामारी से जूझ रहे इलाके में एक सिद्ध तांत्रिक ने पूजा की परंपरा बदलकर लोगों को नई उम्मीद दी थी.

जब जमालपुर में फैली थी महामारी

बारोबारी समिति के सदस्य प्रहलाद घोष बताते हैं कि एक समय यहां मां काली के स्थान पर मां छिन्नमस्तिका की पूजा शुरू कर दी गई थी. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इसके बाद जमालपुर और आसपास के क्षेत्रों में महामारी फैलने लगी. लोग भय और असहायता के माहौल में जी रहे थे. तब स्थानीय बंगाली साधक एवं रेलकर्मी जठिया बाबा ने पश्चिम बंगाल के तारापीठ से प्रसिद्ध तांत्रिक बामाखेपा को जमालपुर आने का आग्रह किया.

बामाखेपा की साधना और बदल गई तस्वीर

कहा जाता है कि सन 1865 में विश्व प्रसिद्ध तांत्रिक बामाखेपा जमालपुर पहुंचे. स्थानीय परंपरा के अनुसार उन्होंने तत्कालीन पुजारी को पूजा पद्धति को लेकर फटकार लगाई और मां छिन्नमस्तिका की पूजा बंद कराकर उसी स्थान पर मां दक्षिणेश्वरी काली की आराधना शुरू कराई. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इसके बाद क्षेत्र में फैली महामारी धीरे-धीरे समाप्त हो गई. जिस स्थान पर बामाखेपा ने साधना और पूजा की थी, आज वहीं मंदिर श्रद्धा का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.

स्वामी विवेकानंद से भी जुड़ा है मंदिर का इतिहास

स्थानीय लोगों के अनुसार भारत भ्रमण के दौरान स्वामी विवेकानंद भी इस स्थान पर पहुंचे थे और यहां पूजा-अर्चना की थी. उस दौर में जमालपुर में बड़ी संख्या में बंगाली समुदाय के लोग निवास करते थे, जिन्होंने इस धार्मिक स्थल के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

बिना बलि की पूजा, सभी समुदायों की आस्था

इस मंदिर की एक विशेषता यह भी है कि यहां किसी प्रकार की पशु बलि नहीं दी जाती. मंदिर के निर्माण और विस्तार में विभिन्न वर्गों और समुदायों के लोगों ने सहयोग किया. विशेष रूप से रेल इंजन कारखाना जमालपुर से जुड़े बंगाली अधिकारियों और कर्मचारियों का योगदान उल्लेखनीय माना जाता है.

आज भी आस्था का प्रमुख केंद्र

आज बारोबारी तल्ला स्थित मां दक्षिणेश्वरी काली मंदिर जमालपुर और आसपास के क्षेत्रों में श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है. शारदीय नवरात्रि के दौरान यहां मां दुर्गा की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है. बंगाली समुदाय के अलावा सभी वर्गों के लोग यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं. यही कारण है कि यह मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जमालपुर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रतीक बन चुका है.

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लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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