लखीसराय में आस्था और विश्वास का केंद्र बना महा गांव का ऐतिहासिक अश्विन दुर्गा मंदिर
अश्विन दुर्गा मंदिर
Aaj Ka Darshan: लखीसराय के महा गांव में स्थित ऐतिहासिक अश्विन दुर्गा मंदिर वर्षों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है. यहां मां दुर्गा के दरबार में हर दिन भक्तों की भीड़ उमड़ती है, जबकि नवरात्र के दौरान पूरा इलाका भक्ति और उत्साह में डूब जाता है.
पीरीबाजार से रविराज आनंद की रिपोर्ट.
Aaj Ka Darshan: सूर्यगढ़ा प्रखंड के अभयपुर कसबा पंचायत स्थित महा गांव का ऐतिहासिक अश्विन दुर्गा मंदिर आज भी श्रद्धा, विश्वास और सनातन संस्कृति की जीवंत पहचान बना हुआ है. दशकों पुराने इस मंदिर में स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज से भी श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. मंदिर को लेकर लोगों में ऐसी मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मां के दरबार में आने वालों की हर मुराद पूरी होती है.
हर दिन उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
अश्विन दुर्गा मंदिर में सुबह और शाम नियमित रूप से पूजा-अर्चना होती है. ग्रामीणों और मंदिर कमेटी के बुजुर्गों के अनुसार यह मंदिर वर्षों पुराना है और इसकी धार्मिक महिमा दूर-दूर तक प्रसिद्ध है. लोग यहां परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना लेकर पहुंचते हैं. सामान्य दिनों में भी मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ रहती है.
नवरात्र में बदल जाता है पूरा माहौल
शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा के दौरान मंदिर का दृश्य बेहद भव्य हो जाता है. महासप्तमी से विजयादशमी तक पूरा क्षेत्र मां दुर्गा की भक्ति में सराबोर रहता है. इस दौरान हजारों श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि परिसर में तिल रखने तक की जगह नहीं बचती. ग्रामीण स्वयंसेवक और प्रशासनिक टीम मिलकर व्यवस्था संभालते हैं ताकि श्रद्धालुओं को किसी तरह की परेशानी न हो.
मेला और सांस्कृतिक कार्यक्रम बनते हैं आकर्षण
नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में लगने वाला मेला और सांस्कृतिक कार्यक्रम लोगों के लिए खास आकर्षण का केंद्र बनते हैं. बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इस धार्मिक आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं, जिससे पूरे इलाके में उत्सवी माहौल बना रहता है.
सामाजिक समरसता की भी पहचान
अश्विन दुर्गा मंदिर सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक विरासत की भी पहचान है. स्थानीय बुद्धिजीवियों का कहना है कि इस ऐतिहासिक धरोहर को और विकसित किए जाने की जरूरत है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी रह सकें.
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लेखक के बारे में
By प्रत्युष प्रशांत
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.
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