टेढ़ागाछ के कमाती गांव में वर्षों से दम तोड़ रहा सरकारी स्टेट बोरिंग
Published by : Divyanshu Prashant Updated At : 06 Jun 2026 3:47 PM
बंद पड़ा स्टेट बोरिंग
State Boring: किशनगंज जिले के टेढ़ागाछ प्रखंड में सरकारी उदासीनता के कारण अन्नदाता बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं. धवेली पंचायत के कमाती गांव में लाखों की लागत से बना स्टेट बोरिंग वर्षों से कबाड़ में तब्दील पड़ा है. सिंचाई का मुख्य साधन ठप होने से परेशान किसानों ने अब सीधे जिला पदाधिकारी (DM) से गुहार लगाई है.
किशनगंज से गौरव कुमार की रिपोर्ट
State Boring: किशनगंज जिला मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान क्षेत्र है, जहां की 80% से अधिक आबादी अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह खेती-किसानी पर निर्भर है. लेकिन जिले के टेढ़ागाछ प्रखंड अंतर्गत धवेली पंचायत के कमाती गांव से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सरकारी दावों और धरातल की हकीकत के बीच के बड़े अंतर को बयां करती है. कमाती गांव में वर्षों से एक बड़ा सरकारी स्टेट बोरिंग (नलकूप) पूरी तरह खराब और बंद पड़ा हुआ है. इसके कारण स्थानीय किसानों के सामने सिंचाई का एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है. ग्रामीणों का आरोप है कि लघु जल संसाधन विभाग और स्थानीय प्रशासन को दर्जनों बार लिखित व मौखिक आवेदन दिए जाने के बावजूद आज तक इस जरूरी बोरिंग को ठीक कराने की जहमत नहीं उठाई गई है.
निजी पंपसेट के भरोसे बढ़े खेती के दाम; कबाड़ बन रही सरकारी संपत्ति
- सैकड़ों एकड़ भूमि प्रभावित: यह स्टेट बोरिंग चालू रहने के दौरान कमाती और आस-पास के खेतों की सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि की सिंचाई का एकमात्र और सबसे सस्ता साधन हुआ करती थी. इसके बंद होने से पूरा कमांड एरिया प्रभावित है.
- लागत में भारी बढ़ोतरी: सरकारी बोरिंग ठप होने के बाद अब छोटे और सीमांत किसानों को निजी पंपिंग सेट और महंगे दामों पर डीजल खरीदकर खेतों की सिंचाई करनी पड़ रही है. इससे फसलों की उत्पादन लागत (कॉस्ट ऑफ कल्टीवेशन) कई गुना बढ़ गई है, जिससे किसानों का मुनाफा शून्य हो गया है.
- फसलों के बर्बाद होने का डर: क्षेत्र के किसान बैंक और स्थानीय महाजनों से भारी ब्याज (कर्ज) लेकर धान, मक्का और हरी सब्जियों की खेती करते हैं. लेकिन समय पर पानी न मिलने के कारण फसलों की ग्रोथ रुक जाती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है.
धरातल पर फेल साबित हो रही योजनाएं; आक्रोशित किसानों ने गिनाए नाम
करोड़ों के बजट के बाद भी हकीकत शून्य: ग्रामीणों का कहना है कि सरकार सूबे के हर खेत तक सिंचाई का पानी पहुंचाने के लिए ‘हर खेत तक पानी’ जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं पर हर साल लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है. लेकिन कमाती गांव में वर्षों से बंद पड़ी यह स्टेट बोरिंग चीख-चीख कर प्रशासनिक लापरवाही की गवाही दे रही है. मरम्मत के अभाव में इसके कीमती कल-पुर्जे अब जंग खाकर नष्ट हो रहे हैं.
इस बदहाल व्यवस्था को लेकर गांव के किसान फहीम उद्दीन, जफीर आलम, अजीम उद्दीन, हाफिज उद्दीन, आलिम उद्दीन, नूरुल हसन, मो. साबीर आलम, एखलक हुसैन एवं अब्दुल कैयूम सहित दर्जनों किसानों ने कड़ा रोष व्यक्त किया है.
आगामी सीजन को लेकर चिंता और DM से गुहार:
किसानों ने स्पष्ट चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि वर्तमान में मानसून का सीजन शुरू हो चुका है और धान की रोपनी का समय नजदीक है. यदि शीघ्र ही इस स्टेट बोरिंग की मरम्मत कराकर इसे दोबारा चालू नहीं किया गया, तो आगामी खरीफ सीजन में इस इलाके के किसानों की कमर पूरी तरह टूट जाएगी.
कमाती गांव के प्रभावित किसानों ने किशनगंज के जिला पदाधिकारी (DM) से इस गंभीर मामले में व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप करने की पुरजोर मांग की है. किसानों का कहना है कि डीएम अविलंब लघु जल संसाधन विभाग के अभियंताओं को स्थल निरीक्षण का निर्देश दें और बोरिंग को चालू कराएं ताकि क्षेत्र का कृषि उत्पादन प्रभावित न हो और अन्नदाताओं को इस भारी आर्थिक तबाही से बचाया जा सके.
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दिव्यांशु प्रशांत वर्तमान में Prabhat Khabar डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से पत्रकारिता में परास्नातक तथा टी. एन. बी. कॉलेज भागलपुर से हिंदी साहित्य में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें पढ़ने, लेखन और कविता-सृजन में विशेष रुचि है। मीडिया क्षेत्र में लगभग एक वर्ष के अनुभव के दौरान वे Dainik Jagran में न्यूज़ राइटर और रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। करियर के शुरुआती दौर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े पॉलिटिकल कंटेंट राइटिंग का विशेष अनुभव प्राप्त किया। सटीक, निष्पक्ष और प्रभावशाली लेखन के माध्यम से पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुँचाना उनकी पेशेवर पहचान है।
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