ग्रीस से सने हाथ, बुलंद हौसले; ठाकुरगंज की बेटियां खुद मैकेनिक बन सुधार रहीं अपनी साइकिल, आत्मनिर्भरता की अनूठी मिसाल
मैकेनिक बन सुधार रहीं अपनी साइकिल
Girls Bicycle Repair: किशनगंज जिले के ठाकुरगंज प्रखंड से एक ऐसी प्रेरणादायक तस्वीर सामने आई है, जो ग्रामीण परिवेश की रूढ़िवादी सोच को कड़ा जवाब दे रही है. गोथरा के एक सरकारी स्कूल की छात्राओं ने तकनीकी काम को ‘सिर्फ लड़कों का’ मानने वाली धारणा को बदलते हुए, खुद मैकेनिक बनकर अपनी साइकिलें दुरुस्त करना शुरू कर दिया है.
ठाकुरगंज (किशनगंज) से बच्छराज नखत की रिपोर्ट
Girls Bicycle Repair: कहते हैं कि अगर बेटियों को सही हौसला और अवसर मिले, तो वे हर उस रूढ़िवादी दीवार को ढहा सकती हैं जो उन्हें पीछे धकेलती है. कुछ ऐसा ही अद्भुत और गौरवान्वित करने वाला नजारा शुक्रवार को ठाकुरगंज प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय, गोथरा (कनकपुर) परिसर में देखने को मिला. यहाँ स्कूल की आधी आबादी (छात्राओं) ने यह साबित कर दिया कि वे केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि व्यावहारिक जीवन की हर छोटी-बड़ी चुनौती से डटकर लड़ना जानती हैं. विद्यालय परिसर में लंच के समय और खाली घंटी के दौरान कई छात्राएं अपनी साइकिलों की मरम्मत (रिपेयरिंग) में खुद जुटी नजर आईं.
नट-बोल्ट कसती और चेन चढ़ाती बेटियों ने तोड़ी रूढ़िवादिता
ग्रामीण और सुदूर सीमावर्ती क्षेत्रों में आज भी मैकेनिक, गाड़ियों की मरम्मत या किसी भी तकनीकी/यांत्रिक कार्य को केवल पुरुषों या लड़कों से जोड़कर ही देखा जाता है. लेकिन गोथरा स्कूल की इन साहसी छात्राओं ने इस जेंडर स्टीरियोटाइप (लैंगिक भेदभाव) को पीछे छोड़ दिया है:
- खुद की मरम्मत: घर से कई किलोमीटर दूर साइकिल चलाकर स्कूल आने वाली ये बच्चियां अब रास्ते में साइकिल खराब होने पर किसी मैकेनिक की दुकान पर निर्भर नहीं रहतीं.
- सीखा हुनर: स्कूल परिसर में कोई छात्रा कुशलता से साइकिल की उतरी हुई चेन चढ़ा रही थी, तो कोई हाथ में पाना-पेचकस लिए ढीले पड़ चुके नट-बोल्ट को पूरी ताकत से कसने में व्यस्त थी.
“व्यावहारिक ज्ञान ही सच्ची शिक्षा” — विद्यालय के शिक्षक
शिक्षकों का नजरिया: छात्राओं के इस आत्मनिर्भर प्रयास को देखकर विद्यालय के शिक्षक और प्रधानाध्यापक भी बेहद गद्गद नजर आए. शिक्षकों का मानना है कि किताबी अक्षरों को रट लेने का नाम शिक्षा नहीं है. शिक्षा का असली और वास्तविक उद्देश्य बच्चों को जीवन की हर परिस्थिति और व्यावहारिक चुनौतियों के लिए आत्मनिर्भर बनाना है.
पढ़ाई के साथ-साथ अपनी रोजमर्रा की समस्याओं का खुद समाधान (Problem Solving) करने की यह क्षमता इन बच्चियों के भीतर एक नया लीडरशिप गुण पैदा कर रही है. स्कूल प्रशासन ने छात्राओं के इस हुनर को एक सकारात्मक और अनुकरणीय उदाहरण माना है.
ग्रीस से सने हाथों में दिख रही है ‘आत्मनिर्भर भारत’ की नई इबारत
साइकिल की मरम्मत करते वक्त इन नन्हीं बच्चियों के कोमल हाथ भले ही काले ग्रीस और मोबिल से पूरी तरह सने हुए थे, लेकिन उनके चेहरों पर किसी काम को सफलतापूर्वक कर लेने की खुशी और आंखों में भविष्य के बड़े सपनों की चमक साफ देखी जा सकती थी.
यह वायरल होती तस्वीर केवल एक साइकिल को ठीक करने की नहीं है, बल्कि यह सीमांचल के सुदूर ग्रामीण इलाके में पनप रही उस नई और प्रगतिशील सोच की गवाही है, जहां बेटियां हर बंदिश को तोड़कर आगे बढ़ने का साहस जुटा रही हैं. स्थानीय बुद्धिजीवियों का कहना है कि आज जो नन्हे हाथ आत्मनिर्भरता से साइकिल के पुर्जे संभाल रहे हैं, कल यही हाथ देश की तरक्की और अंतरिक्ष विज्ञान के बड़े विमान संभालेंगे. ऐसी ही बेटियों के दम पर धरातल पर ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना साकार हो रहा है.
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लेखक के बारे में
By दिव्यांशु प्रशांत
दिव्यांशु प्रशांत वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में परास्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। मीडिया क्षेत्र में लगभग एक वर्ष के अनुभव के दौरान वे दैनिक जागरण में न्यूज़ राइटर और रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। करियर के शुरुआती दौर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े पॉलिटिकल कंटेंट राइटिंग का विशेष अनुभव प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने टी. एन. बी. कॉलेज से हिंदी साहित्य में स्नातक किया है, जिसके कारण साहित्य, पठन-पाठन, लेखन और कविता-सृजन में उनकी विशेष रुचि है। सटीक, निष्पक्ष और प्रभावशाली लेखन के माध्यम से पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुँचाना उनकी पेशेवर पहचान है।
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