बांग्लादेशी ड्रैगन फ्रूट बनाम स्थानीय उत्पादन: किसके पक्ष में झुक रहा बाजार?
ड्रैगन फ्रूट
Dragon Fruit: सीमांचल और उत्तर बंगाल के फल बाजारों में इन दिनों ड्रैगन फ्रूट को लेकर दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है. एक ओर स्थानीय किसानों का ताजा उत्पाद है, तो दूसरी ओर बांग्लादेश से आ रही खेपों के कारण थोक मंडियों में कीमतों पर भारी दबाव बन रहा है.
किशनगंज से गौरव कुमार की रिपोर्ट
Dragon Fruit: कोसी-सीमांचल प्रक्षेत्र के किशनगंज जिला मुख्यालय सहित उत्तर बंगाल के फल बाजारों में इन दिनों विदेशी और स्थानीय कृषि उत्पादों के बीच एक दिलचस्प व्यापारिक मुकाबला देखने को मिल रहा है. मालदा, किशनगंज, ठाकुरगंज और सिलीगुड़ी की मुख्य फल मंडियों में इन दिनों ‘ड्रैगन फ्रूट’ (Dragon Fruit) की आवक चरम पर है. बाजार में एक तरफ जहां स्थानीय प्रगतिशील किसानों द्वारा जैविक तरीके से उपजाया गया ताजा फल मौजूद है, वहीं दूसरी तरफ पड़ोसी देश बांग्लादेश में हो रहे बंपर उत्पादन और वहां से भारतीय बाजारों में हो रही डंपिंग की चर्चा बेहद गर्म है. इस कड़े मुकाबले के कारण थोक बाजारों में ड्रैगन फ्रूट के भाव में अप्रत्याशित गिरावट दर्ज की जा रही है, जिससे स्थानीय उत्पादकों के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं.
भारी निवेश और लागत के मुकाबले घट रहा है मुनाफा
- शुरुआती लागत का बोझ: स्थानीय किसानों और कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि ड्रैगन फ्रूट की खेती पारंपरिक फसलों से बिल्कुल अलग है. इसमें खेत तैयार करने, आरसीसी खंभे (सीमेंटेड पिलर) लगाने, ड्रिप सिंचाई प्रणाली मुस्तैद करने और ग्राफ्टेड पौधे मंगाने में प्रति एकड़ लाखों रुपये का भारी निवेश संधारित करना पड़ता है.
- मुनाफे पर ब्रेक: फसल तैयार होने के बाद जब किसानों को अच्छे रिटर्न की उम्मीद थी, ठीक उसी समय बाजार में बाहरी माल की भारी आपूर्ति (सप्लाई चेन) बढ़ गई. इसके चलते थोक मंडियों में मिलने वाला प्रति किलो का भाव काफी नीचे आ गया है, जिससे किसानों की लागत निकालना भी दूभर हो रहा है.
“बांग्लादेश के सीमावर्ती प्रक्षेत्रों में इन दिनों ड्रैगन फ्रूट की बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खेती हो रही है. मालदा की मुख्य फल मंडियों से कमान संभालते हुए यह विदेशी खेप किशनगंज, ठाकुरगंज, इस्लामपुर और सिलीगुड़ी तक बेहद कम ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट पर पहुंच रही है. खुदरा बाजार में आम उपभोक्ता अक्सर फल की चमक और कम कीमत को तरजीह देते हैं, जिससे स्थानीय फल पिछड़ रहा है.” — स्थानीय थोक फल व्यवसायी
मालदा और सिलीगुड़ी के रास्ते आ रही है खेप; उपभोक्ता देख रहे हैं बजट
हालांकि, गुणवत्ता और जनस्वास्थ्य के दृष्टिकोण से स्थानीय किसानों का दावा शत-प्रतिशत मजबूत है. उनके अनुसार, खेतों से सीधे टूटकर 24 घंटे के भीतर बाजार पहुंचने वाला स्थानीय ड्रैगन फ्रूट बिना किसी केमिकल प्रिजर्वेटिव के पूरी तरह ताजा और रसीला होता है, जबकि बॉर्डर पार से आने वाले फल को लंबा सफर तय करना पड़ता है.
ब्रांडिंग और ग्रेडिंग ही है स्थानीय किसानों का एकमात्र संबल
कृषि बाजार के मुख्य कप्तानों (जानकारों) का मानना है कि इस वैश्विक दौर में मुकाबला केवल ड्रैगन फ्रूट तक सीमित नहीं रहेगा. बाजार में वही कली (उत्पाद) टिक पाएगी जो बेहतर गुणवत्ता, उचित मूल्य और अनवरत आपूर्ति का वैज्ञानिक संतुलन बना सके. ऐसी स्थिति में सीमांचल के कनिष्ठ व वरिष्ठ किसानों के लिए अब यह बड़ी चुनौती है कि वे अपने फल को साधारण तरीके से बेचने के बजाय उसकी उचित ‘ग्रेडिंग’ (साइज के आधार पर छंटनी) करें और ‘ब्रांडिंग’ के माध्यम से उसे मॉल और प्रीमियम आउटलेट्स तक पहुंचाएं.
आगामी महीनों में यदि बांग्लादेशी कड़ियों का दबाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो थोक भाव और अधिक जमींदोज हो सकते हैं. इससे आम उपभोक्ताओं को तो निश्चित रूप से कम कीमत पर यह विदेशी सुपरफूड खाने को मिलेगा, लेकिन कोसी-सीमांचल में नई उम्मीदों के साथ ड्रैगन फ्रूट की बागवानी अपनाने वाले नए उद्यमियों का हौसला पूरी तरह टूट सकता है.
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लेखक के बारे में
By Divyanshu Prashant
दिव्यांशु प्रशांत वर्तमान में Prabhat Khabar डिजिटल में बतौर कंटेंट राइटर कार्यरत हैं। उन्होंने महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा से पत्रकारिता में परास्नातक तथा टी. एन. बी. कॉलेज भागलपुर से हिंदी साहित्य में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की है। हिंदी साहित्य की पृष्ठभूमि होने के कारण उन्हें पढ़ने, लेखन और कविता-सृजन में विशेष रुचि है। मीडिया क्षेत्र में लगभग एक वर्ष के अनुभव के दौरान वे Dainik Jagran में न्यूज़ राइटर और रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं। करियर के शुरुआती दौर में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से जुड़े पॉलिटिकल कंटेंट राइटिंग का विशेष अनुभव प्राप्त किया। सटीक, निष्पक्ष और प्रभावशाली लेखन के माध्यम से पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुँचाना उनकी पेशेवर पहचान है।
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