खगड़िया में धूप और कमजोर बारिश के बीच खेतों में उम्मीद की रोपाई, किसान बोले- एक बीघा धान पर 15 हजार रुपये तक खर्च

खेतो में धान के बिचड़े की रोपाई करते मजदूर | Prabhat Khabar Network
खगड़िया में कमजोर मानसून के बीच किसान पंपसेट से धान की रोपाई कर रहे हैं. बढ़ती लागत और मुआवजे के अभाव में किसानों की चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं.
Khagaria News: खगड़िया में इस बार मानसून की कमजोर रफ्तार और चिलचिलाती धूप के बीच खेतों में एक अलग ही तस्वीर दिखाई दे रही है. घुटनों तक पानी और कीचड़ में घंटों खड़े मजदूर लोकगीत गाते हुए धान की रोपाई कर रहे हैं, जबकि किसान पंपसेट से सिंचाई कर किसी तरह अपनी फसल बचाने की कोशिश में जुटे हैं. खेतों में गूंज रहा गीत— “खेले रहिए धूपे रहिए, रोपे रहिए धान, मने-मन बिचारे रहिए जयबे बाबा धाम”—दरअसल उस संघर्ष की आवाज है, जिसमें उम्मीद अब भी जिंदा है. लेकिन इस उम्मीद की कीमत भी भारी है. किसानों का कहना है कि इस बार एक बीघा धान की खेती पर करीब 15 हजार रुपये तक खर्च आ रहा है और बाढ़ के बाद भी उन्हें समय पर मुआवजा या कृषि अनुदान नहीं मिलता.
बारिश कम, धूप ज्यादा, फिर भी खेतों में रोपाई जारी
खगड़िया जिले के कई इलाकों में सामान्य से कमजोर मानसूनी बारिश हुई है. ऐसे में किसानों को धान की रोपाई के लिए पंपसेट से सिंचाई करनी पड़ रही है. डीजल की बढ़ती कीमतों के कारण सिंचाई की लागत भी काफी बढ़ गई है.
इसके बावजूद किसान खेत खाली छोड़ने को तैयार नहीं हैं. मजदूरों के साथ मिलकर वे सुबह से शाम तक कीचड़ में मेहनत कर रहे हैं, ताकि समय पर रोपाई पूरी हो सके.
लोकगीतों के सहारे बढ़ रहा हौसला
धान की रोपाई के दौरान खेतों में गूंजते लोकगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन की सामूहिक ताकत का प्रतीक हैं. महिलाएं और पुरुष मजदूर मिलकर गीत गाते हुए काम करते हैं, जिससे कठिन श्रम के बीच भी उत्साह बना रहता है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि ऐसे गीत पीढ़ियों से रोपाई के समय गाए जाते रहे हैं और आज भी किसानों के मनोबल को मजबूत करते हैं.
हर साल बाढ़, फिर भी नहीं छोड़ते खेती
खगड़िया जिले के कई प्रखंड हर वर्ष बाढ़ की चपेट में आते हैं. कई बार तैयार फसल पानी में डूब जाती है, लेकिन किसान अगली बार फिर खेत में उतर जाते हैं.
स्थानीय किसान गुरुदेव शर्मा, महेंद्र सिंह, राजकुमार शर्मा, दुखो तांती, प्रकाश साह और वकील यादव बताते हैं कि बाढ़ के बाद भी वे कर्ज लेकर या जमीन गिरवी रखकर दोबारा खेती शुरू करते हैं, क्योंकि खेती ही उनके परिवार की आजीविका का मुख्य आधार है.
एक बीघा धान पर 15 हजार रुपये तक खर्च
किसानों के अनुसार, इस बार जुताई, बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल और मजदूरी मिलाकर एक बीघा धान की खेती पर करीब 15 हजार रुपये तक खर्च आ रहा है.
केवल धान की रोपाई के लिए ही एक बीघा खेत में लगभग 12 मजदूरों की जरूरत पड़ती है. यदि प्रति मजदूर 300 रुपये मजदूरी दी जाए, तो सिर्फ रोपाई पर ही करीब 3,600 रुपये खर्च हो जाते हैं.
मुआवजा और कृषि अनुदान समय पर नहीं मिलने की शिकायत
किसानों का कहना है कि सरकार की ओर से बाढ़ राहत, फसल क्षति मुआवजा और कृषि अनुदान की घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन उसका लाभ अधिकांश किसानों तक समय पर नहीं पहुंचता.
उनका आरोप है कि आवेदन, सर्वे और कागजी प्रक्रियाओं में देरी के कारण जरूरत के समय आर्थिक सहायता नहीं मिल पाती. ऐसे में खेती पूरी तरह मेहनत, कर्ज और किस्मत के भरोसे चल रही है.
Khagaria News:बढ़ती लागत, घटता मुनाफा
किसानों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि धान का उचित मूल्य नहीं मिल रहा. यदि मौसम ने साथ नहीं दिया या बाढ़ आ गई, तो पूरी पूंजी डूबने का खतरा बना रहता है.
एक ओर खेतों में मजदूर कठिन परिश्रम कर रहे हैं, तो दूसरी ओर किसान कर्ज का बोझ उठाकर अन्न उत्पादन में लगे हैं. यही मेहनत अंततः लोगों की थाली तक अनाज पहुंचाती है.
किसानों की सरकार से मांग
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के किसानों ने सरकार से मांग की है कि रियायती दर पर बीज, सुलभ कृषि ऋण, पारदर्शी फसल बीमा और नुकसान का शीघ्र मुआवजा उपलब्ध कराया जाए.
उनका कहना है कि यदि समय रहते अन्नदाताओं को पर्याप्त सहयोग नहीं मिला, तो खेती से किसानों का मोहभंग बढ़ सकता है, जिसका असर भविष्य में खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है.
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