भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान खोला मोर्चा, अंग्रेजों ने बाबूलाल सिन्हा के घर तोड़ आग लगा दी थी

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स्वतंत्रता सेनानियों एवं घर की तस्वीर  | Prabhat Khabar Network

1942 की अगस्त क्रांति में खभैनी के सिन्हा परिवार ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ साहसिक मोर्चा खोला. उन्होंने सत्याग्रह की राह अपनाई और दमन का शिकार हुए, लेकिन आजादी की लौ जलाए रखी. उनका बलिदान देश की आजादी की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

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Freedom Fighter Babulal Sinha : आजादी की लड़ाई का इतिहास केवल बड़े नेताओं और चर्चित आंदोलनों तक सीमित नहीं है. देश के गांव-गांव में ऐसे परिवार भी थे, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने से इनकार कर दिया और इसकी कीमत अपना घर, संपत्ति और सुख-चैन गंवाकर चुकाई. अरवल जिले के खभैनी गांव का सिन्हा परिवार भी स्वतंत्रता आंदोलन के ऐसे ही जांबाज परिवारों में शामिल रहा, जिसने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुलकर मोर्चा लिया था.

बाबूलाल सिन्हा के नेतृत्व में सैकड़ों क्रांतिकारी अरवल पहुंचे थे

अंग्रेजी शासन के दौर में पुलिस की लाल टोपी का नाम सुनकर जहां आम लोग भयभीत हो जाते थे, वहीं खभैनी गांव के बाबूलाल सिन्हा, उनके भाई देवलाल सिन्हा और देवनारायण सिन्हा अंग्रेजों की नजर में लगातार चुनौती बने हुए थे. परिवार के लोगों ने आंदोलनकारियों को संगठित करने, बैठकें कराने और अंग्रेजी शासन के खिलाफ रणनीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. जब अंग्रेज उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सके तो दमन का सहारा लिया और सिन्हा परिवार के घर को हाथी से तुड़वाकर उसमें आग लगा दी.

एआइ से बनायी गयी तस्वीर
एआइ से बनायी गयी तस्वीर

गांधी के आह्वान पर अरवल में भी भड़की थी आंदोलन की चिंगारी

9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के आह्वान पर देशभर में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई. इसका असर अरवल क्षेत्र में भी दिखाई दिया. अंग्रेजी शासन के खिलाफ जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होने लगे और स्थानीय क्रांतिकारी संगठित होकर आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुट गए.

अरवल के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में 16 अगस्त 1942 का दिन भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इस दिन क्रांतिकारियों ने अरवल थाना पर हमला कर वहां तिरंगा फहराया था. इस संघर्ष में अरवल के केश्वर राम और रानीपुर के रामकृत सिंह ने अपने प्राणों की आहुति दी.

बाबूलाल सिन्हा के दलान पर रातभर बनी थी रणनीति

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान खभैनी गांव आंदोलनकारियों की गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था. 15 अगस्त 1942 की शाम बाबूलाल सिन्हा के दलान पर क्रांतिकारियों की बड़ी बैठक हुई. बैठक में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आगे की रणनीति पर चर्चा की गयी. रातभर आंदोलन की तैयारियां होती रहीं.

अगले दिन बाबूलाल सिन्हा के नेतृत्व में सैकड़ों लोग अरवल की ओर निकल पड़े. क्रांतिकारियों ने रास्ते में मुख्य नहर पर पेड़ काटकर रास्ता जाम कर दिया, ताकि अंग्रेजी पुलिस और प्रशासन के लोगों की आवाजाही को रोका जा सके. यह कार्रवाई बताती है कि आंदोलनकारियों ने केवल विरोध प्रदर्शन ही नहीं किया, बल्कि अंग्रेजी प्रशासन की गतिविधियों को बाधित करने की रणनीति भी अपनायी थी.


एआइ से बनायी गयी तस्वीर
एआइ से बनायी गयी तस्वीर

पिता बैठक कराते थे, बेटे अंग्रेजों के निशाने पर थे

सिन्हा परिवार की भूमिका केवल आंदोलन में भाग लेने तक सीमित नहीं थी. परिवार के पिता विश्वधरी गोप भी क्रांतिकारियों के सहयोगी थे. वह आंदोलनकारियों के लिए बैठकें आयोजित करवाते और अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष की रणनीति तैयार करने में मदद करते थे.

उनके बेटे बाबूलाल सिन्हा, देवलाल सिन्हा और देवनारायण सिन्हा भी आंदोलन में सक्रिय थे. अंग्रेजी प्रशासन इन भाइयों को गिरफ्तार करना चाहता था. स्थानीय स्तर पर इनका प्रभाव और क्रांतिकारियों के बीच सक्रियता अंग्रेज अधिकारियों के लिए बड़ी परेशानी बन चुकी थी. पुलिस लगातार उनकी गिरफ्तारी के प्रयास करती रही, लेकिन उन्हें पकड़ने में सफलता नहीं मिली.

गिरफ्तारी में नाकाम अंग्रेजों ने घर पर बरपाया कहर

जब अंग्रेजी पुलिस सिन्हा भाइयों को गिरफ्तार नहीं कर सकी तो परिवार को कमजोर करने के लिए दमन का रास्ता अपनाया गया. अंग्रेज सिपाहियों ने सिन्हा परिवार के घर को हाथी से तुड़वा दिया. इसके बाद घर में आग लगा दी गयी.

इतना ही नहीं, परिवार को आर्थिक रूप से तोड़ने के लिए घर में रखा अनाज भी नष्ट कर दिया गया. मकान और खाद्यान्न की तबाही के जरिए अंग्रेज यह संदेश देना चाहते थे कि जो भी उनके खिलाफ आवाज उठाएगा, उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे.

आजादी के बाद सरकार ने फिर बनवाया था मकान

देश को 1947 में आजादी मिलने के बाद सिन्हा परिवार के संघर्ष और बलिदान को सम्मान मिला. बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने परिवार की कुर्बानी को याद किया और अंग्रेजों द्वारा तोड़े गए मकान का आकलन करवाया.

इसके बाद सरकारी सहायता से मकान का पुनर्निर्माण कराया गया. खभैनी गांव में मौजूद यह मकान आज भी उस दौर के संघर्ष की स्मृति को अपने भीतर समेटे हुए है. यह केवल एक घर नहीं, बल्कि उस परिवार के त्याग और अंग्रेजी हुकूमत के दमन की गवाही देने वाली ऐतिहासिक निशानी के रूप में देखा जाता है.

सिन्हा परिवार को राष्ट्रपति भवन में भी मिला सम्मान

सिन्हा परिवार के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान को वर्षों बाद राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला. भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल ने सिन्हा भाइयों को राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में सम्मानित किया. इस सम्मान ने खभैनी के इस परिवार के संघर्ष को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का काम किया.

स्वतंत्रता सेनानियों एवं घर की तस्वीर  | Prabhat Khabar Network
स्वतंत्रता सेनानियों एवं घर की तस्वीर  | Prabhat Khabar Network

आज भी प्रेरणा देता है परिवार का संघर्ष

खभैनी का सिन्हा परिवार अरवल के स्वतंत्रता आंदोलन के उन अध्यायों में शामिल है, जिसमें देश की आजादी के लिए परिवार ने व्यक्तिगत नुकसान की परवाह नहीं की. अंग्रेजों ने घर छीनने, संपत्ति नष्ट करने और आर्थिक रूप से कमजोर करने की कोशिश की, लेकिन परिवार आंदोलन से पीछे नहीं हटा.

सिन्हा परिवार की कहानी यह बताती है कि स्वतंत्रता संग्राम केवल शहरों में होने वाली बड़ी राजनीतिक गतिविधियों का नाम नहीं था. गांवों में रहने वाले सामान्य परिवारों ने भी अपनी क्षमता और परिस्थितियों के अनुसार अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया. उनका त्याग आज भी आने वाली पीढ़ियों को देशप्रेम, साहस और संकल्प की प्रेरणा देता है.


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Ashwini Kumar

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By Ashwini Kumar

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