बंदूक के साये से मतदान केंद्र तक पहुंचा चोरमारा-गुरमहा, अब सड़क-बिजली-स्कूल और अस्पताल की बारी, लेकिन क्यों उठ रहे है सवाल?

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चोरमारा गांव में बिजली पहुंचाने के लिए गिराए गए पोल पड़े धूल फांक रहे हैं। | Prabhat Khabar Network

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कभी नक्सलियों के खौफ वाले चोरमारा और गुरमहा में अब सुरक्षा बलों की मौजूदगी और प्रशासनिक गतिविधियां बढ़ी हैं. 25 साल बाद गांव में मतदान केंद्र भी खुला, लेकिन बेहतर सड़क, बिजली, अस्पताल और मिडिल स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी अब भी एक बड़ी चुनौती है.

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बरहट : कभी चोरमारा और गुरमहा का नाम सामने आते ही घने जंगल, पहाड़ियां और नक्सलियों का खौफ याद आता था. प्रशासन की पहुंच सीमित थी और सड़क, बिजली, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं भी ग्रामीणों से दूर थीं. लेकिन अब इन गांवों की तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है. जंगल में सुरक्षा बलों के कैंप हैं, प्रशासनिक गतिविधियां बढ़ी हैं और करीब 25 साल बाद चोरमारा में मतदान केंद्र भी बना.

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फोटो   चोरमारा गांव में बिजली पहुंचाने के लिए गिराए गए पोल पड़े धूल फांक रहे हैं।    | Prabhat Khabar Network
चोरमारा गांव

2022 में एफओबी बनने के बाद बदली तस्वीर

फरवरी 2022 में सीआरपीएफ की 215वीं बटालियन की बी कंपनी ने चोरमारा में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस यानी एफओबी स्थापित किया. इसके बाद सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ी और नक्सली गतिविधियों पर दबाव बढ़ा. अप्रैल 2022 में मुंगेर के पैसरा में भी एफओबी बनाया गया.

इसके बाद अर्जुन कोड़ा, बालेश्वर कोड़ा और नागेश्वर कोड़ा समेत कई नक्सलियों ने हथियार डालकर आत्मसमर्पण किया. फरवरी 2026 में एसएसीएम सुरेश कोड़ा ने भी चार हथियारों के साथ आत्मसमर्पण किया.

25 साल बाद गांव में पहुंचा मतदान केंद्र

बदलाव की बड़ी तस्वीर बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में दिखी, जब करीब 25 वर्षों बाद चोरमारा में मतदान केंद्र बनाया गया. इसे मॉडल पोलिंग बूथ घोषित किया गया. ग्रामीणों ने अपने गांव में मतदान किया.

वहीं, 21 जून 2026 को गुरमहा में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का आयोजन हुआ, जिसमें मंत्री श्रेयसी सिंह, जिलाधिकारी नवीन कुमार और पुलिस अधीक्षक विश्वजीत दयाल समेत अधिकारी शामिल हुए. कभी सुरक्षा कारणों से चुनौतीपूर्ण माने जाने वाले इलाके में सरकारी कार्यक्रम का आयोजन बदले हालात को दिखाता है.

नक्सलवाद का असर घटा, लेकिन विकास की चुनौती बाकी

सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने के बाद भी ग्रामीणों की कई जरूरतें पूरी होना बाकी हैं. सबसे बड़ी समस्या बेहतर सड़क संपर्क की है. इसके अलावा पर्याप्त बिजली, मिडिल स्कूल और स्वास्थ्य सुविधा की कमी भी ग्रामीणों के लिए परेशानी बनी हुई है.

बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए दूर जाना पड़ता है, जबकि इलाज के लिए भी दूसरे क्षेत्रों पर निर्भर रहना पड़ता है. यानी नक्सलवाद के बाद अब इन गांवों की अगली लड़ाई बुनियादी सुविधाओं और विकास की है.

सीआरपीएफ ने कहा- अब समग्र विकास जरूरी

सीआरपीएफ 215वीं बटालियन के कमांडेंट विनोद कुमार मोहरिल ने कहा कि चोरमारा और गुरमहा जैसे इलाकों में सुरक्षा और शांति का माहौल मजबूत हुआ है. सरकारी तंत्र की पहुंच भी दुर्गम क्षेत्रों तक बढ़ी है.

उन्होंने कहा कि अब शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, रोजगार और अन्य मूलभूत सुविधाओं के जरिए विकास को गति देना जरूरी है. स्थानीय लोगों की भागीदारी के साथ ही यह विकास सार्थक होगा.

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