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बिहार में अब सरकारी 'मरहम' की दरकार, सुखाड़ से किसानों की जमापूंजी भी खत्म, अब बेटियों की शादी की चिंता

Updated at : 04 Sep 2022 9:52 AM (IST)
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बिहार में अब सरकारी 'मरहम' की दरकार, सुखाड़ से किसानों की जमापूंजी भी खत्म, अब बेटियों की शादी की चिंता

Bihar News: धनरोपनी से वंचित किसान काफी मायूस व परेशानी में हैं कि अब वे क्या करें. घर की रही-सही पूंजी भी धान के बीज बोने से लेकर धान रोपनी व डीजल आदि में खर्च हो गये. किसानों को भोजन के साथ बच्चों की पढ़ाई व बेटियों की शादी की चिंता सता रही है.

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गया में इस बार पर्याप्त बारिश नहीं होने से धान की रोपनी काफी प्रभावित हुई है. हालांकि, समय के बाद हुई बारिश में किसान किसी तरह धान की कुछ रोपनी कर पाये. हालांकि आगे बारिश नहीं हुई, तो रोपी गयी धान की फसल चौपट हो जायेगी. गया में सिंचाई के लिए पानी का स्टोरेज का काफी अभाव है. यहां कोई ऐसी नहर नहीं, जिससे कई हेक्टेयर या एकड़ खेती सिंचित होती हो. अब तक कई नदियां सूखी पड़ी हैं या जिनमें थोड़ा-बहुत पानी है भी वह सिंचाई के लिये पर्याप्त नहीं है. इसकी वजह से उन नदियों से निकलनेवाली पइन भी सूखी है.

मॉनसून के दगा देने से गया के अधिकतर किसान धनरोपनी से वंचित

आहर, पोखरों में भी पानी का स्टोरेज न के बराबर हो पाया है. ऐसी स्थिति में धान या खरीफ फसल केवल बारिश पर ही निर्भर है. इस बार जिले के 24 प्रखंडों में सबसे कम यदि कहीं धान की रोपनी हो पायी है, उनमें आमस, बाराचट्टी व गुरुआ प्रखंड शामिल हैं. आमस में महज 27.1 फीसदी, बाराचट्टी में 44.7 फीसदी, तो गुरुआ में 47.3 फीसदी ही धनरोपनी हो पायी है. जिले में सबसे अधिक बोधगया में 98.0 फीसदी धान की रोपनी हुई है. गुरुआ प्रखंड की गवुनाथ खाप व दुब्बा पंचायतों के कई गांवों में कई-कई एकड़ खेत परती पड़े हैं. रखुनाथ खाप पंचायत के आरसीकला गांव के किसान कृष्णा पासवान बताते हैं कि शुरू में बारिश हुई नहीं. किसी तरह बिचड़े बोये, तो बारिश के अभाव में आधे सूख, पक गये. थोड़ी बारिश हुई, तो धान की हल्की-फुल्की रोपनी की.

आहर के सूखे होनेसे रोपे गयेधान पर भी संकट

अब बारिश के अभाव में वे भी जल रहे हैं. दुब्बा पंचायत के आरसी खुर्द गांव के किसान विजय कुमार ने बताया कि अधिकतर खेत खाली पड़े हैं. थोड़ी धान की रोपनी की है. हालात ऐसे हैं कि अगर यही हाल रहा, तो घर खर्च चलाने के लिए कहीं बाहर काम की तलाश में जाना होगा. फिलहाल सरकारी मदद की सख्त जरूरत है. वैकल्पिक खेती की बात कृषि विभाग के लोग करते हैं. अरहर, मक्का व सरसों का बीज बांटा जा रहा है. लेकिन, वह भी पर्याप्त नहीं है. उसके लायक खेती भी चाहिए. सभी खेत में ये फसलें नहीं होतीं. डीजल अनुदान के लिए काफी लफड़ा है. दुब्बा पंचायत के गोविंदपुर गांव के किसान जगेश्वर प्रसाद कहते हैं कि अब धान की आस छोड़ चुका हूं.

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जमा पूंजी से भी धोना पड़ गया हाथ

धनरोपनी से वंचित किसान काफी मायूस व परेशानी में हैं कि अब वे क्या करें. घर की रही-सही पूंजी भी धान के बीज बोने से लेकर धान रोपनी व डीजल आदि में खर्च हो गये. सरकार नेक्षेत्र को जल्द सूखाग्रस्त घोषित कर सहायता मुहैया नहीं करायी, तो परिवार के भरण-पोषण के लिए दूसरेप्रदेशों में पलायन करना मजबूरी बन जायेगी.

जिले में लक्ष्य के विपरीत सिर्फ 70 प्रतिशत धनरोपन

जिला कृषि कार्यालय सेमिली जानकारी के मुताबिक, दो सितंबर तक धान की रोपनी का लक्ष्य 181832 हेक्टेयर के विपरीत 127322 हेक्टेयर हो पाया है, यानी कुल 70.02 प्रतिशत भूमि पर ही धान की फसल लगायी जा सकी है. बारिश की स्थिति बिल्कुल अच्छी नहीं रही. जून में सामान्य वर्षापात 140.7 मिलीमीटर के विपरीत वास्तविक वर्षापात महज 47.8 मिलीमीटर हुई. इसी तरह जुलाई में सामान्य वर्षापात 288.9 एमएम के विपरीत वास्तविक वर्षापात 112.2 एमएम हुई, अगस्त में सामान्य वर्षापात 248.7 मिलीमीटर के विपरीत 211.3 मिलीमीटर बारिश हुई है.

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