25 कोड़े खाए, 10 महीने जेल में रहे, पुलिस घेराबंदी में एसडीओ कोर्ट में तिरंगा फहराया, जानिए गोपालगंज के नथुनी सिंह की कहानी
नथुनी सिंह का फाइल फोटो
Gopalganj Nathuni Singh : गोपालगंज के नथुनी सिंह ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. 25 कोड़ों की सजा और 10 महीने जेल में बिताने के बावजूद, उन्होंने पुलिस की घेराबंदी में भी तिरंगा फहराया. उनकी अविस्मरणीय देशभक्ति की कहानी.
Gopalganj Nathuni Singh : गोपालगंज के भोजपुरवा गांव के नथुनी सिंह उन स्वतंत्रता सेनानियों में थे, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की यातनाओं के आगे कभी घुटने नहीं टेके. महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह के आह्वान पर पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में कूदे नथुनी सिंह को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर 25 कोड़े और 10 महीने की सजा दी. जेल से निकलने के बाद भी उनका संघर्ष जारी रहा और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई.
पढ़ाई छोड़कर नमक सत्याग्रह में कूद पड़े
नथुनी सिंह का जन्म वर्ष 1914 में गोपालगंज के मांझा प्रखंड के भोजपुरवा गांव में हुआ था. वह सौदागर सिंह के इकलौते पुत्र थे. देश में जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह का आंदोलन तेज हुआ, तब युवा नथुनी सिंह ने पढ़ाई छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने का फैसला किया.
रेह से नमक बनाकर लोगों को किया जागरूक
ब्रिटिश सरकार के नमक कानून के विरोध में नथुनी सिंह ने स्थानीय स्तर पर आंदोलन को मजबूत करने का काम किया. उपलब्ध पारिवारिक विवरण के अनुसार उन्होंने रेह से नमक तैयार कर लोगों तक पहुंचाया और ग्रामीणों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जागरूक किया. इससे आंदोलन की गतिविधियां क्षेत्र में तेज होने लगीं.
रात में हुई छापेमारी और पहली गिरफ्तारी
आंदोलन की गतिविधियों की जानकारी गोपालगंज में तैनात अंग्रेज अधिकारी तक पहुंची. इसके बाद दिसंबर 1930 में कैथवलिया में रात के समय छापेमारी कर नथुनी सिंह को गिरफ्तार किया गया. यह उनकी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पहली गिरफ्तारी थी.
अंग्रेजी अदालत ने दी 25 कोड़े और 10 महीने की सजा
गिरफ्तारी के बाद नथुनी सिंह को अंग्रेजी अदालत से सजा मिली. पारिवारिक विवरण के अनुसार उन्हें प्रतिदिन 25 कोड़े की सजा के साथ 10 महीने के कारावास की सजा सुनाई गई. इतनी कठोर यातना के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा.
जेल से बाहर आते ही फिर तेज किया आंदोलन
जेल से रिहा होने के बाद नथुनी सिंह दोबारा स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए. वह अंग्रेजी पुलिस की गतिविधियों से बचते हुए आंदोलनकारियों के साथ काम करते रहे. उनकी सक्रियता के कारण पुलिस लगातार उन पर नजर रख रही थी.
दूसरी बार रेलवे स्टेशन से हुए गिरफ्तार
आंदोलन में सक्रिय भूमिका के दौरान नथुनी सिंह को दूसरी बार गोपालगंज रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया. जेल से बाहर आने के बाद वह गरम दल के क्रांतिकारियों के संपर्क में आए और अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुट गए.
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी रहे सक्रिय
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान नथुनी सिंह ने फिर मोर्चा संभाला. उपलब्ध विवरण के अनुसार सिधवलिया में रेलवे ट्रैक उखाड़ने के बाद वह अपने साथियों के साथ गोपालगंज पहुंचे. इसके बाद आंदोलनकारियों ने एसडीओ कोर्ट परिसर में तिरंगा फहराने की कोशिश की.
पुलिस की घेराबंदी के बीच फहराया तिरंगा
बताया जाता है कि पुलिस की घेराबंदी के बावजूद नथुनी सिंह और उनके साथियों ने एसडीओ कोर्ट में तिरंगा फहरा दिया. पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और उनके साथ मारपीट की. इसके बाद उन्हें फिर जेल भेज दिया गया.
जगजीवन राम के साथ जेल में बिताए नौ महीने
नथुनी सिंह ने जेल में करीब नौ महीने जगजीवन राम के साथ बिताए. बाद के वर्षों में दोनों के बीच जेल के दिनों की यादें भी साझा हुईं. परिवार के अनुसार, जगजीवन राम जब गोपालगंज आए तो नथुनी सिंह से मुलाकात के दौरान दोनों ने जेल में झेली यातनाओं को याद किया था.
आजादी के बाद पूरी की पढ़ाई
देश के स्वतंत्र होने के बाद नथुनी सिंह जेल से रिहा हुए. इसके बाद उन्होंने अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी करने का फैसला किया. उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहे.
कांग्रेस में पद लेने से किया इनकार
नथुनी सिंह ने कांग्रेस में किसी पद को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. उन्होंने पार्टी और समाज की सेवा को प्राथमिकता देने का संकल्प लिया. परिवार के अनुसार वह जीवन के अंतिम समय तक कांग्रेस के लिए काम करते रहे.
बेटों को नौकरी करने से भी रोका
नथुनी सिंह के पुत्र विश्वनाथ सिंह के संस्मरण के अनुसार, उन्होंने अपने बेटों को सरकारी नौकरी से दूर रखा. उनका मानना था कि नौकरी में रिश्वत जैसी गलत गतिविधियों से परिवार और उनके सार्वजनिक जीवन की प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है.
बेटे ने सुनाया पिता से जुड़ा संस्मरण
विश्वनाथ सिंह के अनुसार वर्ष 1962 में वीएम इंटर कॉलेज से इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी के लिए प्रयास किया था. इसी दौरान उनके पिता ने उन्हें नौकरी करने से रोक दिया. उनका कहना था कि सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और परिवार की प्रतिष्ठा से किसी तरह का समझौता नहीं होना चाहिए.
निधन के बाद भी याद की जाती है उनकी कहानी
नथुनी सिंह का निधन 7 अप्रैल 1990 को हुआ. परिवार के अनुसार हार्ट अटैक के कारण उनकी मौत हुई. आजादी के आंदोलन में उनके योगदान और अंग्रेजी हुकूमत की यातनाओं के बावजूद संघर्ष जारी रखने की उनकी कहानी गोपालगंज के स्वतंत्रता संग्राम की महत्वपूर्ण स्मृतियों में शामिल है.
गुमनाम सेनानियों को याद करना जरूरी
नथुनी सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की कहानियां बताती हैं कि देश की आजादी केवल बड़े नेताओं के संघर्ष का परिणाम नहीं थी. गांव-कस्बों के हजारों लोगों ने भी जेल, यातना और आर्थिक-सामाजिक कठिनाइयों का सामना करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान दिया. नई पीढ़ी तक इन स्थानीय सेनानियों की गाथा पहुंचाना इतिहास को जीवित रखने का महत्वपूर्ण माध्यम है.
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